लेख के इस भाग में लेखक “आरोग्य” और “नीरोगता” के अंतर को स्पष्ट करता है। नीरोगता का अर्थ केवल रोग का न होना है, जबकि आरोग्य का अर्थ है—शरीर, मन और आत्मा की ऐसी अवस्था जिसमें व्यक्ति पीड़ा और विक्षोभ से मुक्त हो। यह बताया गया है कि आज मनुष्य बाह्य रूप से स्वस्थ दिखाई दे सकता है, परंतु भीतर से मानसिक और आध्यात्मिक रोगों से ग्रस्त हो सकता है।
लेख में यह प्रतिपादित किया गया है कि अधिकांश रोगों की जड़ अज्ञान में निहित है। अज्ञान के कारण व्यक्ति अपनी वास्तविक प्रकृति को भूल जाता है और असंयमित जीवन-पद्धति अपनाता है। इससे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकार उत्पन्न होते हैं। मन और आत्मा के विकार प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देते, किंतु उनका प्रभाव धीरे-धीरे शरीर पर भी प्रकट होता है।
सम्यक् दर्शन को स्वास्थ्य की कुंजी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सम्यक् दर्शन का अर्थ है—वस्तुओं को जैसी वे हैं, वैसी ही देखना और समझना। जब व्यक्ति मिथ्या दृष्टि में रहता है, तब वह बाह्य परिस्थितियों और विषय-वासनाओं के प्रभाव में आकर स्वयं को कर्ता और भोक्ता मान लेता है। इससे राग-द्वेष बढ़ते हैं और मानसिक अशांति उत्पन्न होती है, जो रोग का कारण बनती है।
लेख में पूर्वकृत कर्मों और वर्तमान जीवन के संबंध पर भी विचार किया गया है। यह बताया गया है कि व्यक्ति के वर्तमान स्वास्थ्य, परिस्थितियाँ और प्रवृत्तियाँ उसके पूर्व कर्मों से प्रभावित होती हैं। यदि व्यक्ति सम्यक् दृष्टि से जीवन जीता है, तो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह मानसिक संतुलन बनाए रख सकता है। इसके विपरीत, अज्ञान में रहने वाला व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों में भी असंतुष्ट और अशांत रहता है।
इस भाग का निष्कर्ष यह है कि रोगों से मुक्ति केवल बाह्य उपचार से संभव नहीं है। जब तक अज्ञान दूर नहीं होता और सम्यक् दर्शन विकसित नहीं होता, तब तक पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति संभव नहीं है।
Moral
सच्चा आरोग्य बाह्य उपचार से नहीं, बल्कि सम्यक् दृष्टि और सही समझ से प्राप्त होता है।
Final Paragraph
यह विवेचन Jain Sattva के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि Jain philosophy में आरोग्य का आधार सम्यक् दर्शन और अज्ञान से मुक्ति माना गया है। ऐसे चिंतनशील लेख Jain Stories और दर्शन के माध्यम से जीवन को कर्म, चेतना और आत्मिक संतुलन की दृष्टि से समझने में सहायक होते हैं।
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