जैन दर्शन में पुण्य के विषय में कहा गया है कि जो कर्म आत्मा को शुभ की ओर ले जाए, उसे पवित्र करे और सुख की प्राप्ति में सहायक बने, वही पुण्य कहलाता है। ऐसे ही पुण्य का सजीव उदाहरण थीं अक्षय पुण्यात्मा श्रीमती तारादेवी कांकरिया।
भगवान महावीर के उपदेशों के अनुसार उन्होंने अपने पूरे जीवन को अनाथों, असहायों, पीड़ितों और रोगियों की सेवा में समर्पित कर दिया। उनका विश्वास था कि जो व्यक्ति दीन-दुखियों की सहायता करता है, वही वास्तव में अपने जीवन को सार्थक बनाता है। सेवा, करुणा और त्याग उनके जीवन के मूल आधार थे।
श्रीमती तारादेवी ने अपने जीवनकाल में अनेक तीर्थ क्षेत्रों में जिनालयों का निर्माण करवाया और तीर्थंकरों की प्रतिष्ठा करवाई। पालिताणा, मेहसाणा, हस्सार, अहमदाबाद, काकिनाडा, लिलुआ आदि स्थानों पर उनके पुण्य कार्यों के प्रमाण आज भी देखे जा सकते हैं। पालिताणा में उनके द्वारा संचालित भोजनालय वर्षों से साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाओं और यात्रियों की निःस्वार्थ सेवा करता आ रहा है।
उनकी सेवा केवल धार्मिक कार्यों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अस्पतालों में जाकर रोगियों को फल एवं औषधियों का वितरण किया, गरीबों के इलाज की व्यवस्था करवाई और कई बार स्वयं रोगियों को अपने वाहन में अस्पताल पहुँचाया। पालिताणा में उन्होंने वृद्धाश्रम का निर्माण करवाया, जहाँ असहाय वृद्धों की देखभाल परिवार के सदस्यों की तरह की जाती थी।
उनका निजी जीवन अत्यंत सादा और संयमित था। आठ वर्ष की आयु से ही उन्होंने रात्रि भोजन का त्याग कर दिया था। जाति-पाँति और भेदभाव से दूर रहकर उनका व्यवहार सभी के प्रति समान था। कठिन परिस्थितियों और शारीरिक कष्टों के बावजूद भी उन्होंने सेवा और करुणा का मार्ग नहीं छोड़ा।
अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह उनके जीवन के मूल सिद्धांत थे। विवाह के चालीस वर्षों तक उन्होंने किसी पद, प्रतिष्ठा या भोग-विलास की इच्छा नहीं रखी। उनके निरंतर पुण्य कार्यों के कारण उन्हें “अक्षय पुण्यात्मा” कहा गया। उनका जीवन इस सत्य को स्पष्ट करता है कि सच्चा धर्म केवल वचनों में नहीं, बल्कि आचरण में प्रकट होता है।
निःस्वार्थ सेवा, करुणा और त्याग से किया गया प्रत्येक कार्य आत्मा को शुद्ध करता है और वही सच्चा पुण्य कहलाता है।
अक्षय पुण्यात्मा श्रीमती तारादेवी कांकरिया का जीवन Jain Sattva के लिए एक अनुपम प्रेरणा है, जो यह दर्शाता है कि Jain philosophy का वास्तविक स्वरूप सेवा, करुणा और अहिंसा के व्यवहार में प्रकट होता है। ऐसी प्रेरणादायक Jain Stories हमें धर्म को केवल पढ़ने नहीं, बल्कि जीवन में उतारने की प्रेरणा देती हैं।
