Jain Quiz

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Table of Contents

प्रश्न-1: मंदिर का अर्थ क्या है?

उत्तर: मंदिर वह स्थान है जो आत्मा को भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। जहां पहुंचकर मन स्थिर हो जाए, वही मंदिर है।


प्रश्न-2: मंदिर किसका प्रतीक है?

उत्तर: शास्त्रीय दृष्टिकोण से मंदिर समवसरण का प्रतीक है। वर्तमान में यह विद्यालय, चिकित्सालय, जलाशय, न्यायालय, आराधना केंद्र और एकता के उद्यान का प्रतीक है।


प्रश्न-3: मंदिर समवसरण का प्रतीक क्यों है?

उत्तर: जैसे समवसरण में भगवान का उपदेश मिलता है, वैसे ही मंदिर में प्रतिमा के माध्यम से मौन उपदेश प्राप्त होता है। इस कारण मंदिर समवसरण का प्रतीक है।


प्रश्न-4: मंदिर विद्यालय का प्रतीक क्यों है?

उत्तर: मंदिर से जीवन के सही आचरण की शिक्षा मिलती है। यह हमें पापों से बचने, मन की शुद्धता लाने और मानवता को समझने की प्रेरणा देता है।


प्रश्न-5: मंदिर चिकित्सालय का प्रतीक क्यों है?

उत्तर: मंदिर वह स्थान है जहां मन और भावों की अशुद्धता को दूर किया जाता है। यहां विकार, अहंकार और कषाय का उपचार संभव है।


प्रश्न-6: मंदिर जलाशय का प्रतीक क्यों है?

उत्तर: मंदिर एक ऐसा पवित्र जलाशय है, जहां निर्मलता और शांति का अनुभव होता है। इसकी शुद्धता हमारे विचारों को शुद्ध करती है।


प्रश्न-7: मंदिर न्यायालय का प्रतीक क्यों है?

उत्तर: मंदिर हमारे शुभ-अशुभ कर्मों का लेखा-जोखा दिखाने का स्थान है। यहां हमें अपने जीवन के सही और गलत कार्यों का बोध होता है।


प्रश्न-8: मंदिर उद्यान का प्रतीक क्यों है?

उत्तर: जैसे उद्यान में विभिन्न प्रकार के फूल खिलते हैं, वैसे ही मंदिर में विविध लोगों की आराधना होती है। यह सामाजिक और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।


प्रश्न-9: क्या परमात्मा की आराधना सिर्फ मंदिर में की जा सकती है?

उत्तर: परमात्मा की आराधना कहीं भी की जा सकती है, परंतु इसकी प्रेरणा और संस्कार मंदिर से ही मिलते हैं। मंदिर आराधना का प्रारंभिक चरण है।


प्रश्न-10: मंदिर जाते समय हाथ में चावल या सामग्री क्यों रखते हैं?

उत्तर: सामग्री हाथ में होने से हमें मंदिर की याद रहती है, और मन अन्य विचारों में नहीं भटकता। यह दान और त्याग के संस्कारों को भी विकसित करता है।


प्रश्न-11: मंदिर में प्रवेश से पहले पैर क्यों धोते हैं?

उत्तर: पैरों की अशुद्धता मस्तिष्क पर प्रभाव डालती है। मंदिर में पवित्रता बनाए रखने और मन को शुद्ध रखने के लिए पैर धोकर प्रवेश करना आवश्यक है।


प्रश्न-12: प्राचीन मंदिरों में तीन द्वार क्यों होते हैं?

उत्तर: तीन द्वार समवसरण के तीन कोटों का प्रतीक हैं। ये तीन लोकों का भी संकेत देते हैं, जिन्हें पार कर परमात्मा के दर्शन होते हैं।


प्रश्न-13: मंदिर में प्रवेश करते समय ऊँ जय, निःसहि, नमोस्तु का उच्चारण क्यों होता है?

उत्तर: यह शब्द परमात्मा को प्रणाम करने और पापों को त्यागने का संकेत है। साथ ही यह अन्य भक्तों को भी स्थान देने और बाधा से बचने का संकेत देता है।

प्रश्न-14: मंदिर में घंटा क्यों बजाया जाता है?

उत्तर:

  1. घंटा समवसरण में बजने वाली देव दुंदुभि का प्रतीक है।
  2. घंटा बजाने से उसकी ध्वनि तरंगों के माध्यम से सांसारिक विचार टूटते हैं, और मन धार्मिक विचारों की ओर उन्मुख होता है।
  3. यह अप्रमत्तता (जागृति) का प्रतीक है और अभिषेक शुरू होने का संकेत भी देता है।

प्रश्न-15: गर्भगृह क्या होता है?

उत्तर:
मंदिर में मुख्य हॉल के अंदर स्थित एक छोटा कमरा, जहां भगवान की वेदी बनाई जाती है, उसे गर्भगृह कहते हैं।


प्रश्न-16: गर्भगृह क्यों बनाए जाते हैं?

उत्तर:
गर्भगृह भगवान की वेदी के लिए एक पवित्र स्थान है, जहां शुद्ध वस्त्र पहनकर ही प्रवेश किया जाता है। यह विशुद्धता और आत्मिकता को बनाए रखने का प्रतीक है।


प्रश्न-17: मंदिर में प्रतिमा विराजमान करने का क्या महत्व है?

उत्तर:
प्रतिमा आत्मा के दर्पण के समान है। यह हमें अपने स्वरूप का बोध कराती है, मन को एकाग्र करती है, और हमारी बहिरात्मा को अंतरात्मा से जोड़ने का साधन है।


प्रश्न-18: अरहंत और सिद्ध भगवान की प्रतिमा में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • अरहंत प्रतिमा: अष्ट प्रातिहार्य, यक्ष-यक्षिणी और चिन्ह के साथ होती है।
  • सिद्ध प्रतिमा: अष्ट प्रातिहार्य और चिन्ह रहित होती है, क्योंकि सिद्ध भगवान निराकार होते हैं।

प्रश्न-19: दर्शन क्या है?

उत्तर:
दर्शन का अर्थ भगवान की प्रतिमा को श्रद्धा और आत्मावलोकन की दृष्टि से देखना है। यह आत्मा को खोजने और उसकी शुद्धता का अनुभव करने की प्रक्रिया है।


प्रश्न-20: दर्शन करते समय कौन सा स्त्रोत पढ़ना चाहिए?

उत्तर:
दर्शन पाठ पढ़ना चाहिए, जिसमें भोग-विलास की आकांक्षाओं से रहित और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण भाव हों।


प्रश्न-21: भगवान के दर्शन करते समय स्त्रोत या मंत्र क्यों पढ़ते हैं?

उत्तर:
दर्शन के समय स्त्रोत या मंत्र पढ़ने से मन एकाग्र होता है, सांसारिक विचारों से मुक्त होकर शुभोपयोग में लगता है।


प्रश्न-22: भगवान की वेदी पर विराजमान होने का क्या कारण है?

उत्तर:
वेदी गंधकुटी का प्रतीक है, जहां भगवान का सिंहासन होता है। यह भगवान के उच्चतम पद और उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है।


प्रश्न-23: भगवान का सिंहासन किसका प्रतीक है?

उत्तर:
सिंहासन कषायों, वासनाओं और मिथ्यात्व के ऊपर विजय का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि भगवान ने सिंह के समान दृढ़ता से इन पर विजय प्राप्त की है।


प्रश्न-24: भगवान के ऊपर तीन छत्र क्यों होते हैं?

उत्तर:
तीन छत्र भगवान के तीन लोकों (अधोलोक, मध्यलोक, और ऊर्ध्वलोक) के स्वामी होने का प्रतीक हैं। यह आत्मशक्ति को जाग्रत करने की प्रेरणा देते हैं।


प्रश्न-25: भगवान पर 64 चंवर क्यों ढुराए जाते हैं?

उत्तर:
64 चंवर 64 ऋद्धियों का प्रतीक हैं, जो भगवान के चरणों में सेवा के रूप में प्रस्तुत होती हैं। यह संदेश देती हैं कि आत्मिक साधना से सभी भौतिक उपलब्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।


प्रश्न-26: भगवान के पीछे भामंडल क्यों लगाया जाता है?

उत्तर:
भामंडल समवसरण में आत्मा के सात भवों (तीन अतीत, तीन भविष्य, और एक वर्तमान) को देखने का प्रतीक है। यह श्रद्धालुओं को अपने जीवन का अवलोकन करने और आत्मोन्नति की प्रेरणा देता है।


प्रश्न-27: भगवान को नमस्कार किस प्रकार किया जाता है?

उत्तर:
भगवान को पंचांग और साष्टांग दोनों प्रकार से नमस्कार किया जाता है।


प्रश्न-28: पंचांग नमस्कार क्या है?

उत्तर:
दोनों पैरों को मोड़कर, पैर, नितंब, छाती, हाथ और मस्तक को पृथ्वी पर लगाकर नमस्कार करना पंचांग नमस्कार कहलाता है।


प्रश्न-29: पंचांग नमस्कार क्यों किया जाता है?

उत्तर:
यह पांच पापों (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह) से निवृत्ति और मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से किया जाता है।

प्रश्न-31: साष्टांग नमस्कार किस प्रकार और क्यों किया जाता है?

उत्तर:
साष्टांग नमस्कार में दोनों पैर लंबे फैलाकर, हाथों को मस्तक के ऊपर ले जाकर, पेट के बल लेटकर भगवान को नमन किया जाता है। यह पूर्ण समर्पण भाव का प्रतीक है और इसका उद्देश्य संसार से छूटकर मोक्ष प्राप्त करना है।


प्रश्न-32: भगवान के दर्शन करते समय चावल किस प्रकार चढ़ाए जाते हैं?

उत्तर:
दर्शन के समय चावल पांच जगहों पर चढ़ाए जाते हैं।


प्रश्न-33: पांच जगह चावल क्यों चढ़ाए जाते हैं?

उत्तर:
चावल पांच परमेष्ठियों (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) को अर्पित करने के प्रतीक हैं। साथ ही यह भगवान के पंचकल्याणक (गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण) का स्मरण भी कराते हैं।


प्रश्न-34: मंदिर में जिनवाणी के दर्शन क्यों करने चाहिए?

उत्तर:
जिनवाणी भगवान की वाणी का संकलन है, जो धर्म का आधार है। जिनवाणी के दर्शन और भक्ति से हमें सही मार्ग मिलता है और धर्म का अस्तित्व बना रहता है।


प्रश्न-35: जिनवाणी के दर्शन करते समय चावल किस प्रकार और क्यों चढ़ाना चाहिए?

उत्तर:
जिनवाणी के दर्शन करते समय चावल चार स्थानों पर चढ़ाए जाते हैं। यह जिनवाणी के चार अनुयोग (प्रथमानुयोग, चरणानुयोग, करणानुयोग, द्रव्यानुयोग) को दर्शाने का प्रतीक है।


प्रश्न-36: गुरुओं (मुनिराजों) के दर्शन क्यों करने चाहिए?

उत्तर:
गुरु भगवान की वाणी के रहस्यों को समझाने वाले और सही मार्ग दिखाने वाले होते हैं। जिनवाणी और प्रतिमा मूक होती हैं, लेकिन गुरु हमें धर्म को समझाकर हमारा कल्याण करते हैं।


प्रश्न-37: गुरुओं के दर्शन करते समय चावल किस प्रकार और क्यों चढ़ाना चाहिए?

उत्तर:
गुरुओं के दर्शन के समय चावल तीन स्थानों पर चढ़ाए जाते हैं। यह मुनियों के तीन भेद (आचार्य, उपाध्याय, साधु) और रत्नत्रय (सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र) की प्राप्ति का प्रतीक है।


प्रश्न-38: मंदिर में वेदी की प्रदक्षिणा क्यों दी जाती है?

उत्तर:
प्रदक्षिणा भगवान के चारों मुखों का दर्शन करने का प्रतीक है। यह भक्त और भगवान के संबंध को मजबूत करती है और संसार के चक्र से मुक्ति का भाव जाग्रत करती है।


प्रश्न-39: मंदिर में तीन प्रदक्षिणा क्यों दी जाती है?

उत्तर:
तीन प्रदक्षिणाएं मन, वचन और काय (शरीर) की शुद्धता का प्रतीक हैं। यह त्रियोग की शुद्धि का संदेश देती हैं।


प्रश्न-40: मंदिर में शिखर क्यों बनाते हैं?

उत्तर:
शिखर अशोक वृक्ष का प्रतीक है, जो शोकों को समाप्त करता है। शिखर से मंदिर का वातावरण शुद्ध रहता है और दूरस्थ भक्त भी इसकी वंदना कर पुण्य अर्जित कर सकते हैं।


प्रश्न-41: शिखर पर कलश क्यों चढ़ाए जाते हैं?

उत्तर:
कलश पूर्णता और मंगल का प्रतीक है। यह मानव की आकांक्षाओं से मुक्त होकर परमात्मा की प्राप्ति के संदेश का प्रतीक है।


प्रश्न-42: कलश के ऊपर ध्वजा क्यों लगाई जाती है?

उत्तर:
ध्वजा मंदिर में हो रही भक्ति और मंत्रों की पवित्र ऊर्जा को प्रसारित करती है, जिससे वातावरण शुद्ध, शांत और सात्विक बनता है।


प्रश्न-43: मंदिर के सामने मानस्तंभ क्यों बनाते हैं?

उत्तर:
मानस्तंभ अहंकार और कषाय को छोड़ने का प्रतीक है। यह भक्तों को श्रद्धा और समर्पण के साथ मंदिर में प्रवेश करने की प्रेरणा देता है।


प्रश्न-44: मंदिर में कौन-कौन से कार्य नहीं करने चाहिए?

उत्तर:
मंदिर में निम्नलिखित कार्य वर्जित हैं:

  • शरीर की सफाई जैसे नाक, कान का मैल निकालना, खांसना, थूकना, या कुल्ला करना।
  • अशुद्ध वस्त्र पहनना या स्नान किए बिना प्रवेश करना।
  • चमड़े की वस्तुएं, जूते-चप्पल पहनकर आना।
  • भोजन, तंबाकू, गुटखा आदि का सेवन।
  • झूठ, कटु वचन बोलना, लड़ाई-झगड़ा या गप्पें मारना।
  • पूजा स्थल पर गंदगी फैलाना, विकारोत्पन्न चित्र लगाना।
  • देव, शास्त्र, गुरु से ऊंचे स्थान पर बैठना।
  • अयत्नपूर्वक या असावधानी से परिक्रमा करना।

प्रश्न-45: शास्त्र स्वाध्याय (सभा) में कौन-कौन से कार्य नहीं करने चाहिए?

उत्तर:

  • शास्त्र को पैर पर रखकर या अशुद्ध अंगों से छूना।
  • पन्ने पलटने के लिए थूक लगाना।
  • सभा में दीवार का सहारा लेकर बैठना या पैर फैलाना।
  • हंसी-मजाक या इधर-उधर की बातें करना।
  • स्वाध्याय के समय ध्यान भटकाना या प्रसिद्धि की आकांक्षा रखना।
  • शास्त्र को स्वच्छ मन और शरीर से ही स्पर्श करना।

प्रश्न-46: गुरु के निकट कौन-कौन से कार्य नहीं करने चाहिए?

उत्तर:

  1. व्यर्थ की बातें या गपशप न करें।
  2. दूसरों की निंदा न करें।
  3. गुरु से अविनयपूर्वक बात न करें।
  4. गुरु के सामने पैर पर पैर रखकर न बैठें।
  5. छल-कपट न करें।
  6. हमेशा गुरु के पीछे चलें।
  7. गुरु से कुछ भी न छिपाएं।
  8. गुरु के समक्ष गर्व या अहंकार न करें।
  9. गुरु के समक्ष अपनी दृष्टि नीचे रखें।
  10. गुरु की बात का सही अर्थ समझें।
  11. गुरु के उपदेश को आदेश मानकर पालन करें।
  12. पीठ पीछे भी गुरु की निंदा न करें।

प्रश्न-47: मंदिर में क्या कार्य करना चाहिए?

उत्तर:
मंदिर में सांसारिक विषय-वासनाओं को त्यागकर वीतरागी भगवान की आराधना, उपासना, और पूजा करनी चाहिए।


प्रश्न-48: पूजा किसे कहते हैं?

उत्तर:
देव, शास्त्र, और गुरु के गुणों का स्तवन और गुणानुवाद करना पूजा कहलाता है।


प्रश्न-49: इष्ट क्या है?

उत्तर:
मिथ्यात्व, राग, द्वेष, और मोह को नष्ट कर आत्मज्ञ होकर सुखी होना ही इष्ट है। यह मोक्ष रूपी आनंद की शाश्वत संपदा की प्राप्ति का मार्ग है।


प्रश्न-50: इष्ट देव कौन हैं?

उत्तर:
जिन्होंने इष्ट की उपलब्धि प्राप्त कर ली है, वे हमारे इष्ट देव हैं, जैसे अरिहंत और सिद्ध परमात्मा।


प्रश्न-51: इष्ट शास्त्र कौन-से हैं?

उत्तर:
जो शास्त्र इष्ट देव की वाणी को समाहित करते हैं और संसार के बंधनों को नष्ट करने का मार्ग दिखाते हैं, वे इष्ट शास्त्र हैं।


प्रश्न-52: इष्ट गुरु कौन हैं?

उत्तर:
जो इष्ट की प्राप्ति के मार्ग पर आरूढ़ होकर, विषयों की आशा से रहित होकर, वीतरागता की साधना में लीन हैं, वे इष्ट गुरु हैं।


प्रश्न-53: पूजा का शाब्दिक अर्थ क्या है?

उत्तर:
“पू” का अर्थ है पवित्रता। पूजा वह है जो आत्मा को राग-द्वेष और मोह से मुक्त कर पवित्र बनाती है। यह आत्मा को शरीर से अलग करने का साधन है।


प्रश्न-54: पूजा के अन्य नाम क्या हैं?

उत्तर:
योग, यज्ञ, कृत, सपर्या, इज्या, अध्वर, मख, और मह पूजा के पर्यायवाची नाम हैं।


प्रश्न-55: देव, शास्त्र, गुरु के अलावा और किसकी पूजा होती है?

उत्तर:
देव, शास्त्र, गुरु के अलावा नवदेवताओं की पूजा होती है।


प्रश्न-56: नवदेवता कौन-कौन हैं?

उत्तर:

  1. अरिहंत
  2. सिद्ध
  3. आचार्य
  4. उपाध्याय
  5. साधु
  6. जिन चैत्य
  7. जिन चैत्यालय
  8. जिन आगम
  9. जिन धर्म

प्रश्न-57: अरिहंत देव कौन होते हैं?

उत्तर:
जिन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान, समवसरण और छियालीस गुणों को प्राप्त किया है, वे अरिहंत देव कहलाते हैं।


प्रश्न-58: घातिया कर्म क्या हैं?

उत्तर:
जो आत्मा के गुणों (ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त्व) को नष्ट करते हैं और आत्मिक सुख की प्राप्ति में बाधा डालते हैं, वे घातिया कर्म हैं।


प्रश्न-59: घातिया कर्म कितने प्रकार के हैं?

उत्तर:
घातिया कर्म चार प्रकार के होते हैं:

  1. ज्ञानावरणी: ज्ञान को ढकता है।
  2. दर्शनावरणी: दर्शन को ढकता है।
  3. मोहनीय: सम्यक्त्व और चारित्र को बाधित करता है।
  4. अंतराय: कार्यों में विघ्न उत्पन्न करता है।

प्रश्न-60: केवलज्ञान क्या है?

उत्तर:
जो ज्ञान भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों के पदार्थों को एक साथ जानता और देखता है, वह केवलज्ञान है।


प्रश्न-61: समवसरण क्या है?

उत्तर:
समवसरण वह स्थान है जहां अरिहंत परमात्मा धर्म का उपदेश देते हैं। इसका निर्माण कुबेर द्वारा होता है और इसमें सभी जीव समान रूप से धर्म श्रवण करते हैं।


प्रश्न-62: सिद्ध भगवान कौन हैं?

उत्तर:
जिन्होंने घातिया और अघातिया आठों कर्मों का नाश कर दिया है, शरीर रहित होकर लोक के सर्वोच्च भाग में विराजमान हैं, वे सिद्ध भगवान हैं।


प्रश्न-63: अघातिया कर्म क्या हैं?

उत्तर:
जो जीव के सांसारिक जीवन को बनाए रखते हैं और मोक्ष गमन में बाधा नहीं डालते, वे अघातिया कर्म कहलाते हैं।


प्रश्न-64: अघातिया कर्म कितने प्रकार के हैं?

उत्तर:
अघातिया कर्म चार प्रकार के होते हैं:

  1. वेदनीय: सुख-दुख का अनुभव कराता है।
  2. आयु: आत्मा को शरीर में स्थिर रखता है।
  3. नाम: शरीर और उसकी रचना का निर्धारण करता है।
  4. गोत्र: ऊंच या नीच कुल का निर्धारण करता है।

प्रश्न-65: लोक का अग्रभाग क्या है?

उत्तर:
लोक का अग्रभाग मोक्ष है, जिसे “ईषत् ग्राग्भार भूमि” भी कहा जाता है।


प्रश्न-66: आचार्य किसे कहते हैं?

उत्तर:
आचार्य वे होते हैं जो शिष्यों को शिक्षा और दीक्षा प्रदान करते हैं। वे प्रायश्चित देकर शिष्यों को शुद्ध करते हैं, संधा के नायक होते हैं, पंचाचार का पालन स्वयं करते हैं और शिष्यों से कराते हैं।


प्रश्न-67: पंचाचार क्या है?

उत्तर:
पंचाचार पांच प्रकार के आचरण हैं:

  1. ज्ञानाचार – ज्ञान में निपुणता।
  2. दर्शनाचार – श्रद्धा और चिंतन में निपुणता।
  3. चरित्राचार – उत्तम आचरण में निपुणता।
  4. तपाचार – तपस्या में निपुणता।
  5. वीर्याचार – आत्मशक्ति को जाग्रत करने में निपुणता।

प्रश्न-68: साधु किसे कहते हैं?

उत्तर:
जो नग्न दिगंबर मुनि होकर पिच्छी और कमंडलु धारण करते हैं, 28 मूल गुणों का पालन करते हैं और मोक्ष मार्ग की साधना में लीन रहते हैं, उन्हें साधु कहते हैं।


प्रश्न-69: जिन चैत्य किसे कहते हैं?

उत्तर:
चैत्य का अर्थ है प्रतिमा। जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा को जिन चैत्य कहते हैं।


प्रश्न-70: जिन चैत्यालय किसे कहते हैं?

उत्तर:
चैत्यालय दो शब्दों से मिलकर बना है:

  • चैत्य (प्रतिमा)
  • आलय (रहने का स्थान)
    जहां जिन प्रतिमा विराजमान हो, उस पवित्र स्थान को जिन चैत्यालय या मंदिर कहते हैं।

प्रश्न-71: चैत्यालय कितने प्रकार के होते हैं?

उत्तर:
चैत्यालय दो प्रकार के होते हैं:

  1. अकृत्रिम चैत्यालय – ये देवों के भवन या विमान होते हैं और अनादि, अनिधन, शाश्वत माने जाते हैं।
  2. कृत्रिम चैत्यालय – ये मनुष्यों द्वारा निर्मित होते हैं।

प्रश्न-72: जिन आगम क्या है?

उत्तर:
जिन आगम वह वाणी है जो आप्त द्वारा दी गई है। यह चार भागों में विभाजित है:

  1. प्रथमानुयोग – तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि का जीवन दर्शन।
  2. चरणानुयोग – मुनि और श्रावक के आचरण का वर्णन।
  3. करणानुयोग – लोक व्यवस्था और कर्म सिद्धांत का वर्णन।
  4. द्रव्यानुयोग – तत्व, द्रव्य, और पदार्थों का वर्णन।

प्रश्न-73: आप्त किसे कहते हैं?

उत्तर:
जो वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं, वे आप्त कहलाते हैं।


प्रश्न-74: जिन धर्म क्या है?

उत्तर:
जिन धर्म वह है जो जीवों को संसार के दुखों से बचाकर स्वर्ग और मोक्ष जैसी उच्च अवस्थाओं की ओर ले जाता है।


प्रश्न-75: पूजन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर:
पूजन का मुख्य उद्देश्य आत्मशुद्धि है। यह पूज्य के गुणों को प्राप्त कर पूज्यता को उपलब्ध करने का माध्यम है।


प्रश्न-76: पूजन कितने प्रकार की होती है?

उत्तर:
पूजन दो प्रकार की होती है:

  1. द्रव्य पूजन
  2. भाव पूजन

प्रश्न-77: द्रव्य पूजन क्या है?

उत्तर:
जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नेवेद्य, दीप, धूप, और फल जैसे अष्ट द्रव्य अर्पित कर भगवान का गुणानुवाद करना द्रव्य पूजन कहलाता है।


प्रश्न-78: भाव पूजन क्या है?

उत्तर:
अष्ट द्रव्य के बिना, मन से भगवान की स्तुति, भजन, कीर्तन, और ध्यान के माध्यम से गुणगान करना भाव पूजन है।


प्रश्न-79: द्रव्य और भाव पूजन करने का अधिकारी कौन है?

उत्तर:

  • द्रव्य पूजन का अधिकारी श्रावक और गृहस्थ हैं।
  • भाव पूजन का अधिकारी साधु हैं।

प्रश्न-80: पूजन के और क्या भेद हैं?

उत्तर:
जिनागम में पूजन के पांच भेद हैं:

  1. नित्य महपूजन
  2. सर्वतोभद्र पूजन
  3. कल्पद्रुम पूजन
  4. अष्टान्हिका पूजन
  5. इंद्रध्वज पूजन

प्रश्न-81: नित्य महपूजन क्या है?

उत्तर:
प्रतिदिन अपने घर से गंध, पुष्प, और अक्षत आदि ले जाकर जिनालय में पूजा करना नित्य महपूजन कहलाता है।


प्रश्न-82: नित्य महपूजन के कितने भेद हैं?

उत्तर:
नित्य महपूजन के चार भेद हैं:

  1. अष्ट द्रव्य के साथ जिनालय में पूजा करना।
  2. जिन प्रतिमा और मंदिर का निर्माण कराना।
  3. ग्राम, खेत आदि का दान देना।
  4. मुनिराजों को आहार दान देना।

प्रश्न-83: सर्वतोभद्र पूजन क्या है?

उत्तर:
महामुकुटबद्ध राजाओं द्वारा की जाने वाली चतुर्मुख यज्ञ या महापूजा सर्वतोभद्र पूजन कहलाती है।


प्रश्न-84: कल्पद्रुम पूजन क्या है?

उत्तर:
चक्रवर्ती द्वारा किमिच्छिक दान देकर की जाने वाली महापूजा, जिसमें सभी जीवों की इच्छाएं पूर्ण की जाती हैं, कल्पद्रुम पूजन कहलाती है।


प्रश्न-85: अष्टान्हिका पूजन क्या है?

उत्तर:
कार्तिक, फाल्गुन, और आषाढ़ मास के अंतिम आठ दिनों में देवताओं द्वारा नंदीश्वर द्वीप के अकृत्रिम जिन चैत्यालयों में की जाने वाली पूजन अष्टान्हिका पूजन कहलाती है।


प्रश्न-86: इंद्रध्वज पूजन क्या है?

उत्तर:
मध्यलोक के तेरह द्वीपों के अकृत्रिम जिनालयों में इंद्र द्वारा पूजा के उपरांत ध्वजा चढ़ाने की प्रक्रिया इंद्रध्वज पूजन कहलाती है।


प्रश्न-87: निक्षेपों की अपेक्षा पूजन कितने प्रकार की होती है?

उत्तर:
निक्षेपों की अपेक्षा पूजन छह प्रकार की होती है:

  1. नाम पूजन
  2. स्थापना पूजन
  3. द्रव्य पूजन
  4. क्षेत्र पूजन
  5. काल पूजन
  6. भाव पूजन

प्रश्न-88: नाम निक्षेप पूजन क्या है?

उत्तर:
अरिहंत आदि का नाम उच्चारण कर विशुद्ध प्रदेशों में अक्षत आदि अर्पित करना नाम पूजन है।


प्रश्न-89: स्थापना पूजन क्या है?

उत्तर:
भगवान की प्रतिमा को स्थापित कर या प्रतीकात्मक रूप से अक्षत आदि में भगवान की कल्पना कर पूजा करना स्थापना पूजन कहलाता है।


प्रश्न-90: द्रव्य पूजा का स्वरूप क्या है?

उत्तर:
अरिहंत आदि को गंध, पुष्प, धूप, अक्षत आदि अर्पित करना, तीन प्रदक्षिणा देना, और भगवान के गुणों का स्तवन करना द्रव्य पूजा का स्वरूप है।


प्रश्न-91: द्रव्य पूजा कितने प्रकार की होती है?

उत्तर:
द्रव्य पूजा तीन प्रकार की होती है:

  1. सचित्त पूजा
  2. अचित्त पूजा
  3. मिश्र पूजा

प्रश्न-92: क्षेत्र पूजा किसे कहते हैं?

उत्तर:
जिनेन्द्र भगवान के जन्म, तप, ज्ञान, और मोक्ष कल्याणक की भूमि का पूजन क्षेत्र पूजा कहलाती है।


प्रश्न-93: काल पूजा किसे कहते हैं?

उत्तर:
भगवान के गुणों की त्रिकाल वंदना (सुबह, दोपहर, शाम) और उनके दीक्षा, तप, ज्ञान, मोक्ष आदि के दिनों में की जाने वाली पूजा काल पूजा कहलाती है।


प्रश्न-94: पूजा से आत्मकल्याण कैसे संभव है?

उत्तर:
पूजा का राग सांसारिक लाभ के लिए नहीं होता, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने के लिए होता है। वीतराग भगवान की पूजा से सांसारिक इच्छाओं का त्याग होता है और अध्यात्म की ओर झुकाव बढ़ता है। अंतिम परिणति में पूजक स्वयं वीतराग होकर पूज्य बन जाता है।

प्रश्न-95: पूजन श्रावक का कौन-सा आवश्यक कार्य है?

उत्तर:
पूजन श्रावक का प्रथम और आवश्यक कार्य है भगवान की आराधना और उपासना।


प्रश्न-96: श्रावक के मुख्य धर्म कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
श्रावक के मुख्य धर्म हैं:

  1. दान
  2. पूजा

प्रश्न-97: श्रावक किसे कहते हैं?

उत्तर:
श्रावक शब्द तीन अक्षरों से बना है:

  • श्र: श्रद्धावान
  • व: विवेकी
  • क: क्रियावान
    जो देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धा, विवेक और सम्यक क्रियाओं से युक्त हो, वह श्रावक कहलाता है।

प्रश्न-98: पूजन करने का पात्र कौन है?

उत्तर:
वह व्यक्ति पूजन का अधिकारी है:

  • जो श्रद्धालु हो।
  • सप्त व्यसनों से मुक्त हो।
  • भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेकी हो।
  • सदाचारी, संतोषी और अष्ट मूल गुणों से युक्त हो।
  • अंगहीन (विकलांग) और गंभीर रोग से पीड़ित न हो।

प्रश्न-99: पूजन के कितने अंग हैं?

उत्तर:
पूजन के छह अंग हैं:

  1. अभिषेक
  2. आह्वान
  3. स्थापना
  4. सन्निधिकरण
  5. अष्ट द्रव्य
  6. विसर्जन

प्रश्न-100: अभिषेक क्या है?

उत्तर:
शुद्ध प्रासुक जल से भगवान की प्रतिमा का स्नान कराना “अभिषेक” कहलाता है।


प्रश्न-101: पंच परमेष्ठी में अभिषेक किसका होता है और क्यों?

उत्तर:
पंच परमेष्ठी में किसी का साक्षात अभिषेक नहीं होता क्योंकि:

  1. अरिहंत परमेष्ठी: जड़ और चेतन पदार्थ उन्हें स्पर्श नहीं कर सकते।
  2. सिद्ध परमेष्ठी: वे शरीर रहित होते हैं।
  3. आचार्य, उपाध्याय, साधु: स्नान का त्याग करते हैं।

प्रश्न-102: फिर अभिषेक किसका होता है?

उत्तर:
पंच परमेष्ठी के अतिरिक्त जिन चैत्य (प्रतिमा) और जिन चैत्यालय (मंदिर) का अभिषेक होता है।


प्रश्न-103: जिन चैत्यालय का अभिषेक कैसे होता है?

उत्तर:
मंदिर की प्रतिष्ठा के समय शिखर के सामने एक दर्पण रखा जाता है। शिखर का प्रतिबिंब दर्पण में दिखने पर उसका अभिषेक किया जाता है।


प्रश्न-104: जन्माभिषेक के समय इंद्रादि साक्षात अरिहंत का अभिषेक कैसे करते हैं?

उत्तर:
जन्माभिषेक तीर्थंकर की बाल अवस्था में होता है। अरिहंत अवस्था तप कल्याणक के बाद प्राप्त होती है, इसलिए यह अभिषेक बालक अवस्था का होता है।


प्रश्न-105: क्या जिन बिम्ब का अभिषेक जन्माभिषेक मानकर किया जा सकता है?

उत्तर:
नहीं।
जन्माभिषेक तीर्थंकर के जन्म कल्याणक के समय की क्रिया है, जबकि जिन बिम्ब अभिषेक वीतराग अवस्था की प्रतिमा पर किया जाता है।


प्रश्न-106: जिनेन्द्र भगवान तो भावों में हैं, फिर प्रतिमा का अभिषेक क्यों करें?

उत्तर:
प्रतिमा के दर्शन से भगवान के गुण स्मरण होते हैं, जिससे अशुभ कर्मों का संवरण होता है। यह शुभ भाव उत्पन्न करने का साधन है।


प्रश्न-107: प्रतिमा के दर्शन से भावों में देव का निवास कैसे होता है?

उत्तर:
जैसे कैमरे की रील में दृश्य के बिना तस्वीर नहीं बनती, वैसे ही प्रतिमा के बिना भावों में देव का निवास नहीं होता।


प्रश्न-108: अभिषेक करने वाले की वेशभूषा कैसी होनी चाहिए?

उत्तर:
अभिषेककर्ता को इंद्र के समान अलंकृत होना चाहिए। मुकुट, कुंडल, हार, यज्ञोपवीत, धोती और दुपट्टा पहनना चाहिए।


प्रश्न-109: अभिषेक करते समय इंद्र की कल्पना क्यों करें?

उत्तर:
इंद्र का पद क्षायिक सम्यक्त्व का प्रतीक है। यह मोक्ष मार्ग में प्रेरणा देने वाला होता है।


प्रश्न-110: क्या बिना आभूषण के अभिषेक नहीं हो सकता?

उत्तर:
नहीं, यह अनिवार्य नहीं है। यदि आभूषण उपलब्ध हों, तो पहनकर अभिषेक करें। अन्यथा शुद्ध धोती-दुपट्टा पहनकर भी अभिषेक किया जा सकता है।


प्रश्न-111: अभिषेक में धोती-दुपट्टा पहनना क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
वस्त्रों से विचारों पर प्रभाव पड़ता है। श्वेत वस्त्र सात्विकता और पवित्रता को दर्शाते हैं, जिससे भाव भी शुद्ध होते हैं।


प्रश्न-112: अभिषेक और प्रक्षाल में क्या अंतर है?

उत्तर:

  1. अभिषेक: प्रतिमा के शीर्ष भाग (सिर) से जल या पंचामृत डालना।
  2. प्रक्षाल: भगवान के चरणों को जल से धोना या गीले कपड़े से पोंछना।

प्रश्न-113: अभिषेक कितने प्रकार का होता है?

उत्तर:
अभिषेक दो प्रकार का होता है:

  1. पंचामृत अभिषेक।
  2. जल से अभिषेक।

प्रश्न-114: प्रतिदिन कौन-सा अभिषेक करना चाहिए?

उत्तर:
दोनों अभिषेक प्रचलित हैं। जो भावना और निर्मलता बढ़ाए, वही अभिषेक विवेकपूर्वक करें।


प्रश्न-115: अभिषेक किस प्रतिमा का होता है?

उत्तर:
अभिषेक चल (अस्थिर) और अचल (स्थिर) दोनों प्रतिमाओं का होता है।


प्रश्न-116: अभिषेक करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

उत्तर:

  1. स्नानादि के बाद शुद्ध वस्त्र पहनें।
  2. नाक, कान, और मुंह में अंगुली न डालें।
  3. सर्दी-जुकाम या संक्रमण हो, तो अभिषेक न करें।
  4. प्रतिमा को आदरपूर्वक सिर पर रखकर स्थानांतरित करें।

प्रश्न-117: अभिषेक करते समय मुख किस दिशा में होना चाहिए?

उत्तर:

  • प्रतिमा का मुख पूर्व हो, तो अभिषेककर्ता का मुख उत्तर।
  • प्रतिमा का मुख उत्तर हो, तो अभिषेककर्ता का मुख पूर्व।
    दक्षिण-पश्चिम दिशा का मुख न हो, क्योंकि ये दिशाएं नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करती हैं।

प्रश्न-118: पूजन करने वालों का मुख किस दिशा में होना चाहिए?

उत्तर:
पूजन करने वालों का मुख प्रतिमा (देव-शास्त्र-गुरु) की ओर होना चाहिए।


प्रश्न-119: पूजन और अभिषेक में प्रयुक्त अष्ट द्रव्य क्या हैं?

उत्तर:
जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल।


प्रश्न-120: अष्ट द्रव्य कैसे तैयार किए जाते हैं?

उत्तर:

  1. शुद्ध जल को छानकर प्रासुक करें।
  2. चावल को तीन बार धोकर साफ करें।
  3. चंदन, केसर, और कपूर घिसकर चंदन तैयार करें।
  4. पुष्प और फल धोकर स्वच्छ रखें।

प्रश्न-121: जिन चैत्य किसे कहते हैं?

उत्तर:
चैत्य का अर्थ है प्रतिमा। जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा या मूर्ति को जिन चैत्य कहा जाता है।


प्रश्न-122: जिन चैत्यालय किसे कहते हैं?

उत्तर:
चैत्यालय दो शब्दों से मिलकर बना है:

  1. चैत्य: प्रतिमा।
  2. आलय: रहने का स्थान।
    जहां जिन प्रतिमा विराजमान हो, उसे जिन चैत्यालय कहते हैं।

प्रश्न-123: पानी को प्रासुक कैसे करते हैं?

उत्तर:
पानी प्रासुक तीन विधियों से किया जा सकता है:

  1. छानकर
  2. विजातीय पदार्थ (जैसे लौंग, सौंफ) मिलाकर
  3. गर्म करके

प्रश्न-124: पानी किस प्रकार छाना जाता है?

उत्तर:
पानी छानने के लिए कुंए या अन्य स्रोत से पानी धीरे-धीरे निकालकर कपड़े के छन्ने से छाना जाता है। छन्ने का आकार 24 इंच चौड़ा और 36 इंच लंबा होना चाहिए। इसे दोहरा करके पानी के पात्र पर अच्छी तरह बांधकर पानी धीरे-धीरे छाना जाता है।


प्रश्न-125: पानी क्यों छानना चाहिए?

उत्तर:
बिना छने पानी में अनगिनत सूक्ष्म जीव होते हैं, जो नंगी आंखों से नहीं दिखते। वैज्ञानिकों ने पाया है कि एक बूंद अनछने पानी में 36,450 जीव हो सकते हैं। यह जीव हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं और उनका सेवन हिंसा के पाप का कारण बनता है।


प्रश्न-126: पानी छानने के बाद क्या जीव उत्पन्न होते हैं?

उत्तर:
हां, पानी छानने के 48 मिनट बाद उसमें फिर से जीवों की उत्पत्ति हो जाती है।


प्रश्न-127: छने पानी में जीवोत्पत्ति को कैसे रोका जा सकता है?

उत्तर:
यदि पानी में लौंग, सौंफ, इलायची, या चंदन का चूर्ण मिलाया जाए, जिससे उसका रंग और स्वाद बदल जाए, तो पानी में 6 घंटे तक जीव उत्पन्न नहीं होते।


प्रश्न-128: पानी में जीवोत्पत्ति को अधिक समय तक कैसे रोका जा सकता है?

उत्तर:
छने पानी को गर्म किया जाए तो यह 6 घंटे तक जीवोत्पत्ति से मुक्त रहता है। 24 घंटे तक पानी जीवों से मुक्त रखने के लिए इसे 6 घंटे उबालना चाहिए।


प्रश्न-129: क्या भगवान का अभिषेक कच्चे पानी से कर सकते हैं?

उत्तर:
कर सकते हैं, लेकिन करना नहीं चाहिए। क्योंकि 48 मिनट बाद पानी में जीवोत्पत्ति हो जाती है। गर्म करके ठंडे किए गए पानी से अभिषेक करना श्रेष्ठ है।


प्रश्न-130: कच्चे पानी में लौंग डालकर अभिषेक कर सकते हैं?

उत्तर:
हां, परंतु पानी में इतनी मात्रा में लौंग डालनी चाहिए कि उसका रंग और स्वाद बदल जाए। केवल 2-4 लौंग डालने से पानी प्रासुक नहीं होता।


प्रश्न-131: पानी प्रासुक करने में गर्म करने की विधि सबसे श्रेष्ठ क्यों है?

उत्तर:
जहां पानी गर्म करने की सुविधा हो, वहां गर्म करना सबसे श्रेष्ठ है। अन्य स्थानों पर विजातीय पदार्थ मिलाने की विधि उपयोगी है।


प्रश्न-132: देवताओं ने क्षीर सागर के जल से जन्माभिषेक करते समय पानी क्यों नहीं छाना?

उत्तर:
क्षीर सागर का जल स्वाभाविक रूप से प्रासुक होता है, क्योंकि उसमें जीवोत्पत्ति नहीं होती।


प्रश्न-133: पानी छानते समय छन्ना कहां लगाना चाहिए?

उत्तर:
छन्ना हैंडपंप या पात्र के मुख पर लगाकर पानी छाना जा सकता है। लेकिन छानने के बाद छन्ना अलग कर देना चाहिए।


प्रश्न-134: हैंडपंप की जिवाणी कहां करनी चाहिए?

उत्तर:
हैंडपंप की जिवाणी स्वच्छ और कीचड़ रहित बहती नाली में करनी चाहिए। इससे जीवों की रक्षा होती है।


प्रश्न-135: अष्ट द्रव्य थाली में कैसे सजाए जाते हैं?

उत्तर:

  1. जल: शुद्ध जल को कलश में भरें।
  2. चंदन: चंदन, केसर, और कपूर मिलाकर तैयार करें।
  3. अक्षत: धुले और बिना टूटे चावल रखें।
  4. पुष्प: चंदनयुक्त पीले चावल रखें।
  5. नैवेद्य: मिष्टान्न या नारियल चिटक रखें।
  6. दीप: शुद्ध घी का जलता दीप रखें।
  7. धूप: चंदन का चूरा रखें।
  8. फल: बादाम, काजू, किशमिश, आदि धोकर रखें।

प्रश्न-136: अभिषेक कलशों को कैसे तैयार किया जाता है?

उत्तर:
यदि पंचामृत अभिषेक नहीं करना हो, तो चार कलशों में शुद्ध जल भरकर उन्हें पूजन के लिए तैयार करें।

प्रश्न-137: अष्ट द्रव्य या पंचामृत अभिषेक की सामग्री तैयार करते समय हिंसा कैसे रोकें?

उत्तर:
अभिषेक की सामग्री तैयार करते समय विवेकपूर्वक क्रिया करनी चाहिए। ऐसी पूजन, जो कई जन्मों के पाप नष्ट कर सकती है, उसके कारण हुई सावद्य (हिंसा) पूजाजन्य कर्म के क्षय में सहायक होती है। हमें हिंसा का बहाना लेकर आगम की आज्ञा का लोप नहीं करना चाहिए।


प्रश्न-138: भगवान को चढ़ाने के लिए फूल कैसे लाएं जिससे जीव हिंसा न हो?

उत्तर:
फूल तोड़ना हिंसा-जन्य कार्य है, लेकिन आगम में इसे निषिद्ध नहीं किया गया है। फूल लाने के लिए पौधे के नीचे कपड़ा बिछाएं और जो फूल स्वयं गिर जाएं, केवल उन्हें ही उपयोग करें।


प्रश्न-139: यदि फूल उपलब्ध न हों तो क्या करें?

उत्तर:
जहां फूल उपलब्ध न हों, वहां पीले चावल (अक्षत) को केसरिया रंग में रंगकर पुष्प के रूप में उपयोग करें।


प्रश्न-140: क्या धूप, दीप आदि द्रव्य को अन्य पदार्थों में स्थापित करना उचित है?

उत्तर:
स्थापना निक्षेप का उपयोग वहां किया जाता है, जहां मूल वस्तु उपलब्ध न हो। यदि मूल वस्तु उपलब्ध हो, तो उसका विवेकपूर्वक उपयोग करना चाहिए।


प्रश्न-141: नैवेद्य बनाने में क्या सावधानियां रखनी चाहिए?

उत्तर:

  1. नैवेद्य बनाते समय मन, वचन, और काय की शुद्धता होनी चाहिए।
  2. घी आदि घर पर ही निर्मित होना चाहिए।
  3. भक्ष्य-अभक्ष्य पदार्थों का ध्यान रखें।

प्रश्न-142: दीपक के उपयोग में क्या विवेक रखना चाहिए?

उत्तर:

  1. दीपक में इतना घी डालें कि वह पूजन के समय तक जल सके।
  2. अधिक समय तक जलाने की आवश्यकता हो, तो कांच से ढक दें।
  3. कपूर भी उपयोग कर सकते हैं।

प्रश्न-143: क्या टॉर्च से भगवान की आरती कर सकते हैं?

उत्तर:
नहीं। टॉर्च का उपयोग आरती के लिए नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके सैल निर्माण में हिंसा होती है। आरती के लिए घी का दीपक ही उपयुक्त है।


प्रश्न-144: आरती क्या है और इसे कब करनी चाहिए?

उत्तर:
आरती दीपक जलाकर भगवान की महिमा का गुणगान है। इसे प्रातः पूजन के समय और संध्या में सूर्यास्त से पहले करना चाहिए। रात्रि में आरती करना उचित नहीं है।


प्रश्न-145: आरती क्यों करनी चाहिए?

उत्तर:
आरती दीपक के माध्यम से भगवान के केवलज्ञान का प्रतीक है। यह ज्ञान की प्राप्ति की प्रेरणा देती है।


प्रश्न-146: क्या आरती करने से केवलज्ञान हो सकता है?

उत्तर:
आरती करने से केवलज्ञान की प्रेरणा मिलती है। दीपक की लौ स्वर-प्रकाशक होती है, जो केवलज्ञान की प्यास और लक्ष्य को जाग्रत करती है।


प्रश्न-147: पूजन में किस प्रकार की धूप का उपयोग करना चाहिए?

उत्तर:

  1. मलयागिरि, अगर, और तगर जैसे सुगंधित चंदन के चूरे का उपयोग करें।
  2. चूरा सूखा और जीवोत्पत्ति रहित होना चाहिए।
  3. काली मिर्च, लौंग आदि धूप के रूप में उपयोग नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न-148: फल के उपयोग में क्या सावधानी रखनी चाहिए?

उत्तर:

  1. फल सड़ा या घुना हुआ न हो।
  2. फल न अधिक पका हो, न कच्चा हो।
  3. उत्तम और आकर्षक फल का ही उपयोग करें।

प्रश्न-149: घी से अभिषेक करते समय क्या ध्यान रखना चाहिए?

उत्तर:

  1. घी घर पर ही शुद्ध रूप से तैयार करें।
  2. बाजार का घी उपयोग में न लें।

प्रश्न-150: दूध से अभिषेक करते समय क्या सावधानी बरतें?

उत्तर:

  1. उत्तम गाय का दूध प्रयोग करें।
  2. दूध निकालने से पहले गाय के स्तन को शुद्ध पानी से धो लें।
  3. दूध को छानकर और हल्का गर्म कर अभिषेक करें।
  4. डेयरी या पैकेट वाले दूध का उपयोग न करें।

प्रश्न-151: अभिषेक के लिए दही कैसा होना चाहिए?

उत्तर:

  1. दही गर्म दूध से जमाया जाए।
  2. दूध में पुराने दही का जामुन न डालें।
  3. चांदी का सिक्का, बादाम या संगमरमर का पत्थर डालकर दही जमाएं।
  4. दही 24 घंटे के भीतर उपयोग करें।

प्रश्न-152: इक्षु रस (गन्ने का रस) के विषय में क्या विवेक रखना चाहिए?

उत्तर:
गन्ने का रस निकालने से पहले मशीन और गन्ने को गर्म पानी से धो लें। रस निकालते समय शुद्ध वस्त्र पहनें और रस को कपड़े से छान लें। बाजार का अशुद्ध रस उपयोग में न लें। प्रासुक जल में खांड मिलाकर भी इक्षु रस के रूप में सीमित मात्रा में प्रयोग कर सकते हैं।


प्रश्न-153: पंचामृत अभिषेक के लिए समय या सुविधा न हो तो क्या करें?

उत्तर:
यदि पंचामृत अभिषेक की तैयारी संभव न हो, तो शुद्ध जल से अभिषेक करना चाहिए। अभिषेक करना अनिवार्य है और इसे निष्कषाय भाव से करना चाहिए।


प्रश्न-154: क्या पूजन केवल भावों से की जा सकती है?

उत्तर:
हां, भावों से भी पूजन हो सकती है। जैन धर्म में भावों को ही प्रधानता दी जाती है। द्रव्य पूजा के साथ भाव आवश्यक है, लेकिन गृहस्थ अवस्था में द्रव्य पूजा और भाव पूजा दोनों का समन्वय होना चाहिए।


प्रश्न-155: हिंसा तो हिंसा है, चाहे गृहस्थ करें या त्यागी?

उत्तर:
गृहस्थ जीवन में किए गए कार्यों में जीवों की हिंसा होती है, जिससे पाप बंध होता है। परंतु पूजन के परिणाम दया और शुभता से युक्त होते हैं। पूजन से उत्पन्न पुण्य पाप के प्रभाव को न्यून करता है।


प्रश्न-156: अष्ट द्रव्य से पूजन का क्या औचित्य है?

उत्तर:
अष्ट द्रव्य से पूजन का उद्देश्य दान भावना जाग्रत करना और लोभ तथा संग्रह प्रवृत्ति का नाश करना है। यह आत्मशुद्धि और उदारता को प्रोत्साहित करता है।


प्रश्न-157: क्या सम्यग्दृष्टि शासन देवी-देवताओं की अष्ट द्रव्य से पूजन करनी चाहिए?

उत्तर:
नहीं। शासन देवी-देवताओं का यथायोग्य सम्मान “जय जिनेन्द्र” कहकर करना चाहिए, परंतु अष्ट द्रव्य से केवल वीतराग सम्यक दर्शन की पूजा करनी चाहिए।


प्रश्न-158: आर्यिका की अष्ट द्रव्य से पूजा होनी चाहिए या नहीं?

उत्तर:
आर्यिका की अष्ट द्रव्य से पूजा नहीं होनी चाहिए। वे वीतरागता के उच्च स्तर पर नहीं हैं और पंच परमेष्ठी में भी उनका स्थान नहीं है। उनका “वंदामि” तक सम्मान किया जा सकता है।


प्रश्न-159: क्या ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणियों की आरती, पूजन, पाद प्रक्षालन करना उचित है?

उत्तर:
नहीं। ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणियों की आरती, पूजन या पाद प्रक्षालन करना अनुचित है। यह वीतराग धर्म के सिद्धांतों का उल्लंघन है।


प्रश्न-160: पूजन के बाद चढ़ाए गए द्रव्य का क्या करना चाहिए?

उत्तर:
भगवान को चढ़ाए गए द्रव्य प्रसाद नहीं, बल्कि निर्माल्य कहलाते हैं। निर्माल्य द्रव्य का भक्षण नहीं करना चाहिए।


प्रश्न-161: निर्माल्य का क्या अर्थ है?

उत्तर:
निर्माल्य का अर्थ है वह सामग्री जो पूजन के दौरान स्वामित्व भाव से विसर्जित हो चुकी है। इसे भोगी हुई सामग्री माना जाता है, जिसका उपयोग नहीं करना चाहिए।


प्रश्न-162: क्या केवल अष्ट द्रव्य ही निर्माल्य होते हैं?

उत्तर:
नहीं। निर्माल्य में अष्ट द्रव्य के साथ-साथ मंदिर निर्माण, प्रतिष्ठा, तीर्थ यात्रा, रथोत्सव आदि में दिए गए दान और सामग्री भी शामिल हैं। इनका व्यक्तिगत उपयोग अनुचित है।


प्रश्न-163: निर्माल्य का उपयोग करने वालों का आगम में क्या परिणाम बताया गया है?

उत्तर:
निर्माल्य का उपयोग करने वाले व्यक्ति नरकगामी होते हैं। यदि वे मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं, तो कूबड़, कुरूपता या बैल, भैंस, ऊंट जैसे तिर्यंच रूप में जन्म पाते हैं।


प्रश्न-164: गंधोदक क्या है?

उत्तर:गंधोदक का अर्थ है सुगंधित जल। तीर्थंकर भगवान के शरीर के स्पर्श से या उनके स्नान से सुगंधित हुआ जल गंधोदक कहलाता है।

प्रश्न-165: गंधोदक अंग में क्यों लगाना चाहिए?

उत्तर:
गंधोदक जिन प्रतिमा के माध्यम से सूरि मंत्र द्वारा शुद्ध और मंत्रित जल होता है। इस जल में रोगों और जन्म-मरण के कष्टों को समाप्त करने की शक्ति होती है। इसे मस्तक, नेत्र, हृदय, और कंठ जैसे उत्तम अंगों में लगाना चाहिए, जिससे शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि हो।


प्रश्न-166: आह्वाहन किसे कहते हैं?

उत्तर:पूजा के निमित्त अपने इष्ट देवता को प्रतीक रूप में बुलाने की क्रिया को आह्वाहन कहते हैं।


प्रश्न-167: आह्वाहन करते समय किस मंत्र का प्रयोग होता है?

उत्तर:आह्वाहन के लिए यह मंत्र उपयोग किया जाता है:
“ऊँ हृीं श्री देव-शास्त्र-गुरू समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाहनं।”
यदि अन्य तीर्थंकर, गुरू, या शास्त्र का पूजन हो, तो देव-शास्त्र-गुरू के स्थान पर उनका नाम लिया जाता है।


प्रश्न-168: क्या आह्वाहन करने से भगवान मोक्ष से नीचे आते हैं?

उत्तर:नहीं। भगवान मोक्ष से नीचे नहीं आते। आह्वाहन केवल पूजक की भावना को एकाग्र करने और भगवान को साक्षात उपस्थित मानने के लिए किया जाता है।


प्रश्न-169: आह्वाहन करते समय पूजक के क्या भाव होने चाहिए?

उत्तर:आह्वाहन के समय पूजक को ऐसा भाव रखना चाहिए कि भगवान उनके हृदय रूपी मंदिर में पधारें, जिससे उनका हृदय और आत्मा शुद्ध हो।


प्रश्न-170: “अत्र अवतर अवतर संवौषट्” का क्या अर्थ है?

उत्तर:

  • अत्र: यहां।
  • अवतर: पधारें।
  • संवौषट्: आकर्षक और आमंत्रण का संकेत।
    इसका अर्थ है: “हे जिनेन्द्र! यहां (मेरे हृदय में) पधारें।”

प्रश्न-171: स्थापना किसे कहते हैं?

उत्तर:आह्वाहन के बाद जिन पूज्य आत्माओं को बुलाया गया है, उन्हें सम्मान सहित हृदय रूपी सिंहासन पर स्थापित करना स्थापना कहलाता है।


प्रश्न-172: स्थापना करते समय कौन-सा मंत्र पढ़ा जाता है?

उत्तर:”ऊँ हृीं श्री देव-शास्त्र-गुरू समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।”
(जहां अन्य पूजन हो, वहां देव-शास्त्र-गुरू के स्थान पर उनका नाम लिया जाता है।)


प्रश्न-173: स्थापना करते समय क्या भाव होने चाहिए?

उत्तर:स्थापना के समय भाव होना चाहिए कि भगवान मेरे हृदय रूपी सिंहासन पर विराजमान हों और सदा वहीं ठहरें।


प्रश्न-174: “तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्” का क्या अर्थ है?

उत्तर:

  • तिष्ठ तिष्ठ: ठहरें, रुकें।
  • ठः ठः: बैठें, विराजमान हों।
  • स्थापनम्: स्थापित हों।

प्रश्न-175: सन्निधिकरण क्या है?

उत्तर:जिन प्रतिमा के सम्मुख, निकट और श्रद्धा सहित उपस्थित होने की क्रिया सन्निधिकरण कहलाती है।


प्रश्न-176: सन्निधिकरण करते समय क्या भाव होने चाहिए?

उत्तर:सन्निधिकरण करते समय भाव होना चाहिए कि भगवान के निकट होने से मन-वचन-कर्म की चंचलता मिट जाए और संसार से अलग होने का अनुभव हो।


प्रश्न-177: आह्वाहन, स्थापना आदि करते समय किसका अवलंबन लेना चाहिए?

उत्तर:मुख्य रूप से भावों का अवलंबन लेना चाहिए। लौंग या पुष्प के माध्यम से आह्वाहन और स्थापना की प्रक्रिया की जा सकती है।


प्रश्न-178: मंदिर में प्रतिमा होते हुए भी आह्वाहन और स्थापना क्यों?

उत्तर:मूल रूप से भगवान सिद्ध लोक में विराजमान हैं। भक्ति-भावना को जागृत करने और पूजा में एकाग्रता लाने के लिए यह क्रिया की जाती है। यह प्रक्रिया भक्त के मन में भगवान के प्रति सजीव भावना उत्पन्न करती है।


प्रश्न-179: ठोना क्या होता है?

उत्तर:ठोना पूजा के दौरान आह्वाहन और स्थापना के लिए उपयोग होने वाला एक पात्र है, जो अन्य पात्रों से ऊंचा होता है।


प्रश्न-180: अष्ट द्रव्य से भगवान की पूजन करते समय जल क्यों चढ़ाया जाता है?

उत्तर:जल आत्मा का प्रतीक है। जैसे जल का कोई रंग या आकार नहीं होता, वैसे ही आत्मा का कोई स्थायी रूप नहीं होता। जल चढ़ाते समय यह भावना रखी जाती है कि हमारी आत्मा जल की तरह निर्मल हो और हम अपने स्वभाव में लौट आएं। जल समर्पण का प्रतीक है, जैसे जल बहकर सागर में मिल जाता है, वैसे ही आत्मा परमात्मा में समाहित हो।

प्रश्न-181: पूजन में चंदन क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर:
चंदन अपनी सुगंध और शीतलता के लिए प्रसिद्ध है, जो विषम परिस्थितियों में भी स्थिर रहती है। यह प्रतीक है कि हे प्रभु! जैसे चंदन अपनी प्रकृति नहीं बदलता, वैसे ही मैं भी संसार के बीच रहकर अपने लक्ष्य से विचलित न होऊं और आत्मिक शीतलता बनाए रखूं।


प्रश्न-182: पूजन में अक्षत (चावल) क्यों चढ़ाए जाते हैं?

उत्तर:
अक्षत (चावल) को शुद्धता और वीतरागता का प्रतीक माना जाता है। धान से छिलका हटने पर अक्षत बनता है, जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का प्रतीक है। यह भावना रखी जाती है कि जैसे चावल अशुद्धियों से रहित है, वैसे ही मेरी आत्मा भी कर्मों की कालिमा से मुक्त हो जाए।


प्रश्न-183: पूजन में पुष्प क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर:
पुष्प मोह और आकर्षण का प्रतीक है। भगवान के समक्ष पुष्प चढ़ाते समय यह भावना रखी जाती है कि हे प्रभु! आपने मोह को नष्ट किया है, कृपया मुझे भी मोह और काम वासनाओं से मुक्त करें।


प्रश्न-184: पूजन में नैवेद्य क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर:
नैवेद्य चढ़ाकर यह भावना व्यक्त की जाती है कि हे भगवान! आपने क्षुधा (भूख) को नष्ट कर आत्मा के रस का पान किया है। मैं भी आत्मिक तृप्ति की प्राप्ति करना चाहता हूं और सांसारिक भोगों से मुक्त होना चाहता हूं।


प्रश्न-185: पूजन में दीपक क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर:
दीपक स्वप्रकाशक और ऊर्ध्वगामी होता है। यह ज्ञान का प्रतीक है। दीपक चढ़ाते समय भावना होती है कि जैसे दीप अंधकार को नष्ट करता है, वैसे ही प्रभु! आपका ज्ञान मोह का नाश कर आत्मा को मुक्ति की ओर ले जाए।


प्रश्न-186: पूजन में धूप क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर:
धूप ध्यान और कर्मों की आहुति का प्रतीक है। यह भावना होती है कि ध्यान रूपी अग्नि में मैं अपने अष्ट कर्मों को भस्म कर आप जैसा पवित्र बन सकूं।


प्रश्न-187: पूजन में फल क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर:
फल चढ़ाकर यह प्रार्थना की जाती है कि हे प्रभु! मैंने जो आपकी पूजा की है, उसका फल मुझे मोक्ष के रूप में प्राप्त हो। मैं सांसारिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि आपके समान शाश्वत मुक्ति के लिए पूजा कर रहा हूं।


प्रश्न-188: पूजन में अध्र्य क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर:
अष्ट द्रव्य के विकल्प के रूप में अध्र्य चढ़ाया जाता है। यह भावना होती है कि मैं क्षणभंगुर पदार्थों को त्यागकर आत्मा के शाश्वत पद (अनघ्र्य पद) को प्राप्त करूं।


प्रश्न-189: जयमाला क्या होती है?

उत्तर:
जयमाला पूजा के अंत में गाए जाने वाला गेय भाग है, जिसमें भगवान की महिमा, गुण, और अतिशय का वर्णन होता है। यह पूजा का सार प्रस्तुत करता है।


प्रश्न-190: पुष्पांजलि किसे कहते हैं?

उत्तर:
पूजन के अंत में भगवान के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए पुष्पों को अंजलि में भरकर अर्पित करना पुष्पांजलि कहलाता है।


प्रश्न-191: विसर्जन किसे कहते हैं?

उत्तर:
विसर्जन पूजा का उपसंहार है। इसमें भगवान का विसर्जन नहीं होता, बल्कि पूजा की समाप्ति होती है। विसर्जन में पूजन के दौरान हुई त्रुटियों के लिए क्षमा-याचना की जाती है और पूजा का समापन किया जाता है।

प्रश्न-192: शांतिपाठ क्यों और किसलिए किया जाता है?

उत्तर:
शांतिपाठ का उद्देश्य केवल अपने ही कल्याण के लिए पूजा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के प्राणियों की शांति, सुख और कल्याण की कामना करना है। इसमें सर्वभूत हित की भावना होती है। शांतिपाठ सच्ची पूजा का प्रतीक है, क्योंकि यह आत्मकल्याण के साथ-साथ समस्त जीवों के लिए मंगल कामना को भी समाहित करता है।

शांतिपाठ विसर्जन के उपरांत किया जाता है, और इसमें विश्व में शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। यह पूजा के समापन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

विशेष सुझाव:

  • पूजन के उपरांत समय हो तो शास्त्र वाचन करें।
  • यदि समय कम हो, तो जाप और ध्यान अवश्य करें।

परमेष्ठी अर्चना (मुनि पुलक सागर जी):
यह एक भक्तिपूर्ण रचना है, जिसमें आत्मिक शुद्धता और परमात्मा से मिलन की कामना व्यक्त की गई है। इसमें भक्त अपनी आत्मा को णमोकार मंत्रमय जीवन बनाने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रार्थना करता है।

भावार्थ:

  • चरणों की छाया में शरण: सांसारिक झंझावातों से बचने और अरिहंत भगवान की शरण में जाने की प्रार्थना।
  • बंधनों से मुक्ति: सांसारिक मोह-माया और झूठे संबंधों से आत्मा को मुक्त करने की आकांक्षा।
  • ज्ञान की प्राप्ति: अज्ञान को दूर कर आत्मा को आत्मिक ज्ञान और सत्य का अनुभव कराने की विनती।
  • आत्मा का अनुभव: साधुओं के सान्निध्य में आत्मा के सच्चे स्वरूप का परिचय पाने की इच्छा।

यह अर्चना आत्मा की शुद्धता, ज्ञान की प्राप्ति, और साधुओं के प्रति श्रद्धा को जागृत करती है।