भगवान महावीर ने मानव जीवन को जिस धर्म का मार्ग दिखाया, उसे यदि एक शब्द में व्यक्त किया जाए तो वह शब्द “अहिंसा” होगा। और यदि अहिंसा के वास्तविक स्वरूप को समझना हो, तो उसका स्वाभाविक परिणाम है — अपरिग्रह। महावीर का यह अनुपम उपहार केवल साधुओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए है।
महावीर स्वामी ने यह स्पष्ट किया कि संसार में दुःख का मूल कारण केवल हिंसा नहीं है, बल्कि परिग्रह, अर्थात् संग्रह और आसक्ति भी उतना ही बड़ा कारण है। हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील — ये चारों पाप परिग्रह से ही जन्म लेते हैं। जब मनुष्य अधिक से अधिक संग्रह करने की इच्छा रखता है, तब वह दूसरों को नुकसान पहुँचाने से भी नहीं हिचकता।
ग्रंथ में बताया गया है कि मनुष्य हिंसा करता है संग्रह के लिए, झूठ बोलता है संग्रह के लिए और चोरी भी उसी इच्छा के कारण करता है। कुशीलता भी जीवन में परिग्रह की ही एक विकृत अभिव्यक्ति है। इस प्रकार परिग्रह वह मूल जड़ है, जिससे शेष चारों पाप विकसित होते हैं।
महावीर ने परिग्रह को केवल धन-संपत्ति तक सीमित नहीं माना। उनके अनुसार भाव-परिग्रह — जैसे क्रोध, मान, माया और लोभ — भी उतने ही घातक हैं। बाह्य परिग्रह से अधिक खतरनाक यह आंतरिक परिग्रह है, क्योंकि यही व्यक्ति की दृष्टि को दूषित करता है और उसे पाप की ओर प्रवृत्त करता है।
ग्रंथ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि परिग्रह का त्याग एक क्षणिक निर्णय नहीं है, बल्कि निरंतर साधना है। महावीर ने श्रावक धर्म में परिग्रह-परिमाण व्रत दिया, ताकि गृहस्थ भी सीमित संग्रह के साथ धर्ममय जीवन जी सकें। वहीं साधु जीवन में पूर्ण अपरिग्रह को अनिवार्य माना गया।
इतिहास साक्षी है कि महावीर निर्वाण के बाद भी उनके संघ की परंपरा सुरक्षित रही। इसका मुख्य कारण यही था कि उनके अनुयायियों ने आत्म-परिग्रह और बाह्य परिग्रह दोनों से सावधानीपूर्वक दूरी बनाए रखी। भिन्न-भिन्न मतभेदों के बावजूद अपरिग्रह की मूल भावना सभी परंपराओं में समान रही।
ग्रंथ यह भी बताता है कि पंथ-भेद के समय भी हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील को पाप मानने में कोई मतभेद नहीं था। मतभेद केवल परिग्रह की व्याख्या और उसके व्यावहारिक स्वरूप को लेकर हुए। फिर भी महावीर की मूल शिक्षा — परिग्रह त्याग ही शांति का मार्ग है — कभी अप्रासंगिक नहीं हुई।
अंततः यह स्पष्ट होता है कि महावीर का अपरिग्रह केवल संन्यास का सिद्धांत नहीं है। यह मानव जीवन को संतुलित, शांत और करुणामय बनाने का व्यावहारिक सूत्र है। जो जितना परिग्रह छोड़ता है, वह उतना ही भय, तनाव और संघर्ष से मुक्त होता है। यही महावीर का मानवता को दिया गया अनुपम उपहार है।
सच्ची शांति संग्रह में नहीं, बल्कि आवश्यकता से अधिक छोड़ देने की क्षमता में है।
भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित अपरिग्रह का सिद्धांत Jain philosophy में अहिंसा और आत्म-नियंत्रण की आधारशिला है। यदि आप जैन धर्म के ऐसे ही गूढ़, व्यावहारिक और जीवन-परिवर्तनकारी विचार पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी
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