Introduction to Shree 1008 Shanti Nath Bhagwan: 16th Tirthankara of Jainism

Introduction to Shree 1008 Shanti Nath Bhagwan 16th Tirthankara of Jainism

श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान का परिचय

अगले भगवानकुन्थुनाथ भगवान
पिछले भगवानधर्मनाथ भगवान
चिन्हहिरन
पिताराजा श्री विश्वसेन जी
माताऐरादेवी
जन्म स्थानहस्तिनापुर में
निर्वाण स्थानश्री सम्मेद शिखर जी
रंगसुवर्ण वर्ण (तपाये हुये सोने जैसा)
पूर्व पर्याय का नामराजा श्री मेघरथ जी
वंशइक्ष्वाकु वंश
जन्म नक्षत्रभरणी नक्षत्र में
अवगाहनाचालिस धनुष
आयुएक लाख वर्ष 
दीक्षा वृक्षनंद्यार्वत वृक्ष के नीचे
प्रथम आहारमंदरपुर नगर में राजा सुमित्र द्वारा  खीर का आहर
क्षेत्रपालश्री सिंद्धसेन, श्री महोसन, श्री लोकसेन, श्री विनय केत
श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान का परिचय

श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

गर्भभाद्रपद कृष्णा 7
जन्मज्येष्ठ, कृष्ण 14
दीक्षाज्येष्ठ, कृष्ण 14
केवलज्ञानपॉश, शुक्ल 10
मोक्षज्येष्ठ, कृष्ण 14
वैराग्यदपर्ण में अपने मुख के दो प्रतिबिम्ब देखकर
श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान का समवशरण

शासन यक्षगरूढ़ देव
शासन देवीमहामानसी देवी
गणधरछत्तिस गणधर
प्रमुख गणधरश्री चक्रायुध
आर्यिकायेंसाठ हजार तीन सौ आर्यिकायें
श्रावकदो लाख
श्राविकायेंचार लाख
प्रमुख आर्यिका गणिनी आर्यिका हरिषेणा
आंसन से मोक्ष गयेखड़गासन से
कौन से कूट से मोक्षकुंदप्रभ कूट
श्री 1008 शान्तिनाथ भगवान का समवशरण

शान्तिनाथ भगवान का परिचय

इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में रत्नपुर नाम का नगर है। उस नगर का राजा श्रीषेण था, उसके सिंहनन्दिता और अनिन्दिता नाम की दो रानियाँ थीं। इन दोनों के इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन नाम के दो पुत्र थे। उसी नगर की सत्यभामा नाम की एक ब्राह्मण कन्या अपने पति को दासी पुत्र जानकर उसे त्याग कर राजा के यहाँ अपने धर्म की रक्षा करते हुए रहने लगी थी। किसी एक दिन राजा श्रीषेण ने अपने घर पर हुए आदित्यगति और अरिंजय नाम के दो चारण मुनियों को पड़गाहन कर स्वयं आहारदान दिया और पंचाश्चर्य प्राप्त किये तथा दश प्रकार के कल्पवृक्षों के भोग प्रदान करने वाली उत्तरकुरू भोगभूमि की आयु बाँध ली। दान देकर राजा की दोनों रानियों ने तथा दान की अनुमोदना से सत्यभामा ने भी उसी उत्तम भूमि की आयु बाँध ली। सो ठीक ही है क्योंकि साधुओं के समागम से क्या नहीं होता ?

किसी समय इन्द्रसेन की रानी श्रीकांता के साथ अनन्तमति नाम की एक साधारण स्त्री आई थी उसके साथ उपेन्द्रसेन का स्नेह समागम हो गया। इस निमित्त को लेकर बगीचे में दोनों भाईयों का युद्ध शुरू हो गया। राजा इस युद्ध को रोकने में असमर्थ रहे, साथ ही अत्यन्त प्रिय अपने इन पुत्रों के अन्याय को सहन करने में असमर्थ रहे अत: वे विषपुष्प सूँघ कर मर गये, वही विषपुष्प सूँघ कर दोनों रानियाँ और सत्यभामा भी प्राणरहित हो गर्इं तथा धातकीखंड के पूर्वार्ध भाग में जो उत्तर कुरू प्रदेश है उसमें राजा तथा सिंहनन्दिता दोनों दम्पत्ती हुए और अनिन्दिता नाम की रानी आर्य तथा सत्यभामा उसकी स्त्री हुई, इस प्रकार वे सब वहाँ भोगभूमि के सुखों को भोगते हुए सुख से रहने लगे।

राजा श्रीषेण का जीव भोगभूमि से चयकर सौधर्म स्वर्ग के श्रीप्रभ विमान में श्रीप्रभ नाम का देव हुआ। रानी सिंहनन्दिता का जीव उसी स्वर्ग के श्रीनिलय विमान में विद्युत्प्रभा नाम की देवी हुई। सत्यभामा ब्राह्मणी और अनिन्दिता नाम की रानी के जीव क्रमश: विमलप्रभ विमान में शुक्लप्रभा नाम की देवी और विमलप्रभ नाम के देव हुए।

विजयार्ध के राजा ज्वलनजटी के पुत्र अर्ककीर्ति थे। उस अर्ककीर्ति की ज्योतिर्माला रानी से राजा श्रीषेण का जीव श्रीप्रभ विमान से स्वर्ग में आकर अमिततेज नाम का पुत्र हुआ है। सिंहनन्दिता का जीव अमिततेज की ज्योति:प्रभा नाम की स्त्री हुई। देवी अनिन्दिता का जीव श्रीविजय हुआ और सत्यभामा का जीव अमित- तेज की बहन सुतारा हुआ है। यह अमिततेज विद्याधर समस्त पर्वों में उपवास करता था। दोनों श्रेणियों का अधिपति होने से वह सब विद्याधरों का राजा था। किसी एक दिन दमवर नामक चारणऋद्धिधारी मुनि को विधिपूर्वक आहारदान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किये।

किसी समय अमिततेज और विजय दोनों ने मुनि के मुख से अपनी आयु एक मास मात्र है, ऐसा जानकर अपने पुत्रों को राज्य दे दिया और बड़े आदर से अष्टान्हिका पूजा की तथा नन्दन नामक मुनि के समीप चन्दन वन में सब परिग्रह त्याग कर प्रायोपगमन सन्यास धारण कर लिया। अन्त में समाधिमरण कर शुद्ध बुद्धि का धारक अमिततेज तेरहवें स्वर्ग के नन्द्यावर्त विमान में रविचूल नाम का देव हुआ और श्रीविजय भी इसी स्वर्ग के स्वस्तिक विमान में मणिचूल नाम का देव हुआ।

वहाँ के भोगों का अनुभव करके रविचूल नाम का देव नन्द्यावर्त विमान से च्युत होकर जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में स्थित वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी के राजा स्तिमित सागर और उनकी रानी वसुन्धरा के अपराजित नाम का पुत्र हुआ। मणिचूल देव भी स्वस्तिक विमान से च्युत होकर उसी राजा की अनुमति नाम की रानी के अनन्तवीर्य नाम का लक्ष्मीसम्पन्न पुत्र हुआ। ये दोनों भाई बलभद्र और अद्र्धचक्री नारायण पद के धारक हुए तथा दमितारि नाम के प्रतिनारायण को मार कर चक्ररत्न को प्राप्त कर बहुत काल तक राज्य के उत्तम सुखों का अनुभव करते रहे।

किसी समय अनन्तवीर्य के मरण से बलभद्र अपराजित पहले तो बहुत दु:खी हुए, जब प्रबुद्ध हुए तब अनन्तसेन नामक पुत्र के लिए राज्य देकर यशोधर मुनिराज के समीप दीक्षा धारण कर ली। वे तीसरा अवधिज्ञान प्राप्त कर अत्यन्त शान्त हो गये और तीस दिन का सन्यास लेकर अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए।

इधर अनन्तवीर्य नारायण नरक गया था वहाँ पर जाकर धरणेन्द्र ने उसे समझा-बुझाकर सम्यक्त्व ग्रहण कराया। उसके प्रभाव से वह अनन्तवीर्य नरक से निकलकर जम्बूद्वीपसम्बन्धी भरतक्षेत्र के विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी के राजा मेघवाहन की रानी मेघमालिनी से मेघनाद नाम का पुत्र हो गया। कालान्तर में दीक्षा लेकर आयु के अन्त में मरकर तपश्चरण के प्रभाव से अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र हो गये और इन्द्र के साथ उत्तम प्रीति रखकर स्वर्ग सुख का अनुभव करने लगे।

अपराजित का जीव, जो पहले इन्द्र हुआ था, वह पहले च्युत हुआ और इसी जम्बूद्वीपसम्बन्धी पूर्व विदेह क्षेत्र के रत्नसंचय नामक नगर में राजा क्षेमंकर तीर्थंकर की कनकचित्रा नाम की रानी से मेघ की बिजली के समान पुण्यात्मा श्रीमान ‘वङ्काायुध’ नाम का पुत्र हुआ। इस पुत्र की उत्पत्ति में आधान, प्रीति, सुप्रीति, धृति, मोद, प्रियोद्भव आदि क्रियायें की गई थीं। जिस प्रकार चन्द्रमा शुक्लपक्ष को पाकर कान्ति तथा चन्द्रिका से सुशोभित होता है उसी प्रकार वह वङ्काायुध भी तरुण अवस्था पाकर राज्यलक्ष्मी तथा लक्ष्मीमती नामक स्त्री से सुशोभित हो रहा था। उन वङ्काायुध और लक्ष्मी के अनन्तवीर्य (प्रतीन्द्र) का जीव सहस्रायुध नाम का पुत्र हुआ। इस प्रकार राजा क्षेमंकर पुत्र-पौत्र आदि परिवार से परिवृत होकर राज्य करते थे।

किसी समय क्षेमंकर तीर्थंकर वङ्काायुध का राज्याभिषेक करके लौकान्तिक देवों द्वारा स्तुति को प्राप्त होते हुए तपोवन को चले गये और तपश्चरण के प्रभाव से केवलज्ञान को प्राप्त कर बारह सभाओं को दिव्यध्वनि द्वारा सन्तुष्ट करने लगे।

इधर वङ्काायुध के यहाँ चक्ररत्न की उत्पत्ति हो गई और वे चक्रवर्ती हो गये। दिग्विजय करके षट्खंड पृथ्वी को जीतकर सार्वभौम राज्य करने लगे। किसी समय नाती के केवलज्ञान का उत्सव देखने से वङ्काायुध चक्रवर्ती को भी आत्मज्ञान हो गया जिससे उन्होंने सहस्रायुध पुत्र को राज्य देकर क्षेमंकर तीर्थंकर के समीप पहुँचकर दीक्षा धारण कर ली। दीक्षा के बाद ही उन्होंने सिद्धिगिरि पर्वत पर जाकर एक वर्ष के लिये प्रतिमायोग धारण कर लिया। उनके चरणों का आश्रय पाकर सर्पों की बहुत सी वामियाँ तैयार हो गर्इं सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुष चरणों में लगे हुए शत्रुओं को भी बढ़ाते हैं। उनके शरीर के चारों तरफ सघनरूप से जमी हुई लताएँ भी मानों उनके परिणामों की कोमलता को प्राप्त करने के लिए उन मुनिराज के पास जा पहुँची थीं।

इधर वङ्काायुध के पुत्र सहस्रायुध को भी किसी कारण से वैराग्य हो गया उन्होंने अपना राज्य शतबली को दे दिया, सब प्रकार की इच्छाएँ छोड़ दीं और पिहितास्रव नाम के मुनिराज के पास उत्तम संयम धारण कर लिया। जब पिता वङ्काायुध मुनि का एक वर्ष का योग समाप्त हो गया तब वे सहस्रायुध मुनि उन्हीं के समीप जा पहुँचे। पिता-पुत्र दोनों ने चिरकाल तक दु:सह तपस्या की। अन्त में वे वैभार पर्वत के अग्रभाग पर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने शरीर से स्नेह रहित हो संन्यास मरण किया और ऊध्र्व ग्रैवेयक के नीचे के सौमनस नामक विमान में बड़ी ऋद्धि के धारक अहमिन्द्र हुए।

इसी जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में पुष्कलावती नाम का देश है उसकी पुंडरीकिणी नगरी में राजा घनरथ राज्य करते थे, उनकी मनोहरा नाम की सुन्दर रानी थी। वङ्काायुध का जीव ग्रैवेयक से च्युत होकर उन्हीं दोनों के मेघरथ नाम का पुत्र हुआ उसके जन्म के पहले गर्भाधान आदि क्रियाएँ हुई थीं। उन्हीं घनरथ राजा की मनोरमा नाम की दूसरी रानी से सहस्रायुध का जीव (अहमिन्द्र) दृढ़रथ नाम का पुत्र हो गया। राजा घनरथ ने तरुण होने पर मेघरथ का विवाह प्रियमित्रा और मनोरमा के साथ किया था और दृढ़रथ का विवाह सुमतिदेवी से किया था। इस प्रकार पुत्र-पौत्र आदि सुख के समस्त साधनों से युक्त राजा घनरथ सिंहासन पर बैठकर इन्द्र की लीला धारण कर रहे थे।

इसी बीच में प्रियमित्रा पुत्रवधू की सुषेणा नाम की दासी घनतुंड नामक मुर्गा लाकर दिखलाती हुई बोली कि यदि दूसरों के मुर्गे इसे जीत लें तो मैं एक हजार दीनार दूँगी। यह सुनकर छोटी पुत्रवधू की कांचना नाम की दासी एक वङ्कातुंड नामक मुर्गा ले आई । दोनों का युद्ध होने लगा, वह युद्ध दोनों मुर्गों के लिए दु:ख का कारण था तथा देखने वालों के लिये भी हिंसानन्द आदि रौद्रध्यान कराने वाला था अत: धर्मात्माओं के देखने योग्य नहीं, ऐसा विचार कर राजा घनरथ बहुत से भव्यजीवों को शान्ति प्राप्त कराने के लिये अपने पुत्र मेघरथ से उन मुर्गों के पूर्व भव पूछने लगे।

अवधिज्ञान के धारक मेघरथ ने बतलाया कि जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र में रत्नपुर नाम का नगर है। उसमें भद्र और धन्य नाम के दो सगे भाई थे। दोनों ही गाड़ी चलाने का काम करते थे एक दिन दोनों भाई नदी के किनारे बैल के निमित्त लड़ पड़े और मरकर नदी के किनारे श्वेतकर्ण-ताम्रकर्ण नाम के जंगली हाथी हुए। वहाँ भी पूर्व वैर के संस्कार से लड़कर मरे और दोनों भैंसे हुए पुन: लड़कर मरे और मेढ़ा हुए, मेढ़े भी परस्पर में लड़े और ये दोनों मुर्गे हुए हैं। दो विद्याधर हम लोगों से मिलने के लिये यहाँ आये थे और विद्या से इन मुर्गों में प्रविष्ट होकर इन्हें और अधिक शक्तिशाली बना रहे हैं। इस तरह मेघरथ से सब समाचार सुनकर उन विद्याधरों ने अपना स्वरूप प्रकट किया राजा घनरथ और कुमार मेघरथ की पूजा की तथा गोवर्धन मुनिराज के समीप जाकर दीक्षा ग्रहण कर ली।

उन दोनों मुर्गों ने भी अपना पूर्वभव का सम्बन्ध जानकर परस्पर का बंधा हुआ वैर छोड़ दिया और अन्त में साहस के साथ संन्यास धारण कर लिया एवं भूतरमण तथा देवरमण नामक वन में ताम्रचूल और कनकचूल नाम के भूतजातीय व्यन्तर हुए।

उसी समय वे देव पुंडरीकिणी नगरी में आये और प्रेम से मेघरथ युवराज की पूजा कर अपने मुर्गे के भव को बतलाकर परमोपकारी मान कर कुछ प्रत्युपकार करने की प्रार्थना करने लगे। अन्त में उन दोनों देवों ने कहा कि आप मानुषोत्तर पर्वत के भीतर विद्यमान समस्त संसार को देख लीजिये। हम लोगों के द्वारा आपका कम-से-कम यही उपकार हो जावे। देवों के ऐसा कहने पर कुमार ने जब ‘तथास्तु’ कहकर स्वीकृति प्रदान कर दी, तब देवों ने कुमार को उनके आप्तजनों के साथ अनेक ऋद्धियों से युक्त विमान में बैठाया और आकाशमार्ग में ले जाकर यथाक्रम से चलते-चलते सुन्दर देश दिखलाये।

वे बतलाते जाते थे कि यह पहला भरतक्षेत्र है, यह हैमवत है इत्यादिरूप से सभी क्षेत्र, पर्वतों को दिखलाते हुए मानुषोत्तर पर्वत के भीतर के सभी अकृत्रिम चैत्यालयों की वन्दना करा दी। तदनन्तर बड़े उत्सव से युक्त नगर में वापस आ गये। आचार्य कहते हैं कि जो मनुष्य अपने उपकारी का प्रत्युपकार नहीं करता है वह गन्धरहित पुष्प के सदृश जीवित भी मृतकवत् है।

घनरथ महाराज तीर्थंकर थे। किसी दिन विरक्त होकर दीक्षित हो गये। इधर मेघरथ महाराज ने दमवर नामक ऋद्धिधारी मुनि को आहारदान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किये। कभी नन्दीश्वर पर्व में महापूजा कर रात्रि में प्रतिमायोग से ध्यान करते थे और इन्द्रों द्वारा पूजा को प्राप्त होते थे। किसी दिन घनरथ तीर्थंकर के समवसरण में धर्मोपदेश को सुनकर संसार, शरीर, भोगों से विरक्त हो गये और अपने पुत्र को राज्य देकर दृढ़रथ भाई और अन्य सात हजार राजाओं के साथ दीक्षित होकर ग्यारह अंग के पाठी हो गये और सोलह कारण भावनाओं से तीर्थंकर नाम कर्म का बंध कर लिया। अत्यन्त धीर-वीर मेघरथ ने दृढ़रथ के साथ ‘नभस्तिलक’ पर्वत पर आकर एक महीने का प्रायोपगमन संन्यास धारण कर शरीर छोड़कर अहमिन्द्र१ पद प्राप्त कर लिया।

शान्तिनाथ भगवान का गर्भ और जन्म

कुरुजांगल देश की हस्तिनापुर राजधानी में काश्यप गोत्रीय राजा विश्वसेन राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम ऐरावती था। भगवान शान्तिनाथ के गर्भ में आने के छह महीने पहले से ही इन्द्र की आज्ञा से हस्तिनापुर नगर में माता के आँगन में रत्नों की वर्षा होने लगी और श्री, ह्री, धृति आदि देवियाँ माता की सेवा में तत्पर हो गईं। भादों वदी सप्तमी के दिन भरणी नक्षत्र में रानी ने गर्भ धारण किया। उस समय स्वर्ग से देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया और माता-पिता की पूजा की।

नव मास व्यतीत होने के बाद रानी ऐरादेवी ने ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन याम्ययोग में प्रात:काल के समय तीन लोक के नाथ ऐसे पुत्ररत्न को जन्म दिया। उसी समय चार प्रकार के देवों के यहाँ स्वयं ही बिना बजाये शंखनाद, भेरीनाद, सिंहनाद और घंटानाद होने लगे। सौधर्मेन्द्र ऐरावत हाथी पर चढ़कर इन्द्राणी और असंख्य देवगणों सहित नगर में आया तथा भगवान को सुमेरू पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक मनाया। अभिषेक के अनन्तर भगवान को अनेकों वस्त्रालंकारों से विभूषित करके उनका ‘शान्तिनाथ’ यह नाम रखा, इस प्रकार भगवान को हस्तिनापुर वापस लाकर माता-पिता को सौंपकर पुनरपि आनन्द नामक नाटक करके अपने-अपने स्थान पर चले गये।

भगवान की आयु एक लाख वर्ष की थी। शरीर चालीस धनुष ऊँचा था। सुवर्ण के समान कांति थी। ध्वजा, तोरण, शंख, चक्र आदि एक हजार आठ शुभ चिन्ह उनके शरीर में थे। उन्हीं विश्वसेन की यशस्वती रानी के चक्रायुध नाम का एक पुत्र हुआ। देवकुमारों के साथ क्रीड़ा करते हुए भगवान शान्तिनाथ अपने छोटे भाई चक्रायुध के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे। भगवान की यौवन अवस्था आने पर उनके पिता ने कुल, रूप, अवस्था, शील, कान्ति आदि से विभूषित अनेक कन्याओं के साथ उनका विवाह कर दिया। इस तरह भगवान के जब कुमार काल के पच्चीस हजार वर्ष व्यतीत हो गये, तब महाराज विश्वसेन ने उन्हें अपना राज्य समर्पण कर दिया। क्रम से उत्तमोत्तम भोगों का अनुभव करते हुए जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष और व्यतीत हो गये, तब उनकी आयुधशाला में चक्रवर्ती के वैभव को प्रगट करने वाला चक्ररत्न उत्पन्न हो गया। इस प्रकार चक्र को आदि लेकर चौदह रत्न और नवनिधियाँ प्रगट हो गर्इं। इन चौदह रत्नों में चक्र, छत्र, तलवार और दण्ड ये आयुधशाला में उत्पन्न हुए थे, काकिणी, चर्म और चूड़ामणि श्रीगृह में प्रकट हुए थे, पुरोहित, सेनापति और गृहपति हस्तिनापुर में मिले थे और कन्या, गज तथा अश्व विजयार्ध पर्वत पर प्राप्त हुए थे। नौ निधियाँ भी पुण्य से प्रेरित हुए इन्द्रों के द्वारा नदी और सागर के समागम पर लाकर दी गई थीं।

चक्ररत्न के प्रकट होने के बाद भगवान ने विधिवत् दिग्विजय करके छह खण्ड को जीतकर इस भरतक्षेत्र में एकछत्र शासन किया था। जहाँ पर स्वयं भगवान शान्तिनाथ इस पृथ्वी पर प्रजा का पालन करने वाले थे, वहाँ के सुख और सौभाग्य का क्या वर्णन किया जा सकता है ? इस प्रकार चक्रवर्ती के साम्राज्य में भगवान की छ्यानवे हजार रानियाँ थीं, बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा उनकी सेवा करते थे और बत्तीस यक्ष हमेशा चामरों को ढुराया करते थे। चक्रवर्तियों के साढ़े तीन करोड़ बन्धु कुल होते हैं। अठारह करोड़ घोड़े, चौरासी लाख हाथी, तीन करोड़ उत्तम वीर, अनेकों करोड़ विद्याधर और अठासी हजार म्लेच्छ राजा होते हैं। छ्यानवे करोड़ ग्राम, पचहत्तर हजार नगर, सोलह हजार खेट, चौबीस हजार कर्वट, चार हजार मटंब और अड़तालीस हजार पत्तन होते हैं इत्यादि अनेकों वैभव होते हैं।

चौदह रत्नों के नाम-अश्व, गज, गृहपति, स्थपति, सेनापति, स्त्री और पुरोहित ये सात जीवित रत्न हैं एवं छत्र, असि, दण्ड, चक्र, काकिणी, चिन्तामणि और चर्म ये सात रत्न निर्जीव होते हैं।

नवनिधियों के नाम-काल, महाकाल, पाण्डु, मानव, शंख, पद्म, नैसर्प, पिंगल और नानारत्न ये नौ निधियाँ हैं। ये क्रम से ऋतु के योग्य द्रव्यों, भाजन, धान्य, आयुध, वादित्र, वस्त्र, हम्र्य, आभरण और रत्नसमूहों को दिया करती है । दशांग भोग-दिव्यपुर, रत्न, निधि, सैन्य, भोजन, भाजन, शय्या, आसन, वाहन और नाट्य ये चक्रवर्तियों के दशांग भोग होते हैं। इस प्रकार संख्यात हजार पुत्र-पुत्रियों से वेष्टित भगवान शान्तिनाथ चक्रवर्ती के साम्राज्य को प्राप्त कर दस प्रकार के भोगों का उपभोग करते हुए सुख से काल व्यतीत कर रहे थे। भगवान तीर्थंकर और चक्रवर्ती होने के साथ-साथ कामदेव पद के धारक भी थे।

शान्तिनाथ भगवान का तप

भगवान का वैराग्य-जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष साम्राज्य पद में व्यतीत हो गये, तब एक समय अलंकारगृह के भीतर अलंकार धारण करते हुए उन्हें दर्पण में अपने दो प्रतिबिम्ब दिखाई दिये। उसी समय उन्हें आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया और पूर्व जन्म का स्मरण भी हो गया, तब भगवान संसार, शरीर और भोगों के स्वरूप का विचार करते हुए विरक्त हो गये। उसी समय लौकान्तिक देवों ने आकर अनेकों स्तुतियों से पूजा-स्तुति की। अनन्तर सौधर्म आदि इन्द्र सभी देवगणों के साथ उपस्थित हो गये। भगवान ने नारायण नाम के पुत्र का राज्याभिषेक करके सभी कुटुम्बियों को यथायोग्य उपदेश दिया।

भगवान का दीक्षा ग्रहण-अनन्तर इन्द्र ने भगवान का दीक्षाभिषेक करके ‘सर्वार्थसिद्धि’ नाम की पालकी में विराजमान करके हस्तिनापुर नगर के सहस्राम्र वन में प्रवेश किया। उसी समय ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन भरणी नक्षत्र में बेला का नियम लेकर भगवान ने पंचमुष्टि लोंच करके ‘नम: सिद्धेभ्य:’ कहते हुए जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली और सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग करके ध्यान में स्थिर होते ही मन:पर्ययज्ञान प्राप्त कर लिया।भगवान का आहार-मन्दिरपुर के राजा सुमित्र ने भगवान शान्तिनाथ को खीर का आहार देकर पंचाश्चर्य वैभव को प्राप्त किया। इस प्रकार अनुक्रम से तपश्चरण करते हुए भगवान के सोलह वर्ष व्यतीत हो गये।

शान्तिनाथ भगवान का केवलज्ञान और मोक्ष

भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति-भगवान शान्तिनाथ सहस्राम्र वन में नंद्यावर्त वृक्ष के नीचे पर्यंकासन से स्थित हो गये और पौष कृष्ण दशमी के दिन अन्तर्मुहूर्त में दसवें गुणस्थान में मोहनीय कर्म का नाश कर बारहवें गुणस्थान में ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय का सर्वथा अभाव करके तेरहवें गुणस्थान में पहुँचकर केवलज्ञान से विभूषित हो गये और उन्हें एक समय में ही सम्पूर्ण लोकालोक स्पष्ट दीखने लगा। पहले भगवान ने चक्ररत्न से छह खण्ड पृथ्वी को जीतकर साम्राज्य पद प्राप्त किया था, अब भगवान ने ध्यानचक्र से विश्व में एकछत्र राज्य करने वाले मोहराज को जीतकर केवलज्ञानरूपी साम्राज्य लक्ष्मी को प्राप्त कर लिया। उसी समय इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने दिव्य समवसरण की रचना कर दी।

समवसरण का संक्षिप्त वर्णन-यह समवसरण पृथ्वीतल से पाँच हजार धनुष ऊँचा था, इस पृथ्वीतल से एक हाथ ऊँचाई से ही इसकी सीढ़ियाँ प्रारंभ हो गयी थीं। ये सीढ़ियाँ एक-एक हाथ की थीं और बीस हजार प्रमाण थीं। यह समवसरण गोलाकार रहता है। इसमें सबसे पहले धूलिसाल के बाद चारों दिशाओं में चार मानस्तम्भ हैं। मानस्तंभों के चारों ओर सरोवर है। फिर निर्मल जल से भरी परिखा है। फिर पुष्पवाटिका (लतावन) है। उसके आगे पहला कोट है। उसके आगे दोनों ओर से दो-दो नाट्यशालाएँ हैं। उसके आगे दूसरा अशोक, आम्र, चंपक और सप्तपर्ण का वन है। उसके आगे वेदिका है। तदनन्तर ध्वजाओं की पंक्तियाँ हैं। फिर दूसरा कोट है। उसके आगे वेदिका सहित कल्पवृक्षों का वन है। उसके बाद स्तूप, स्तूपों के बाद मकानों की पंक्तियाँ हैं। फिर स्फटिक मणिमय तीसरा कोट है। उसके भीतर मनुष्य, देव और मुनियों की बारह सभाएँ हैं। तदनन्तर पीठिका है और पीठिका के अग्रभाग पर कमलासन पर चार अंगुल अधर ही अर्हन्त देव विराजमान रहते हैं। भगवान पूर्व या उत्तर की ओर मुँह कर स्थित रहते हैं फिर भी अतिशय विशेष से चारों दिशाओं में ही भगवान का मुँह दिखता रहता है। समवसरण में चारों ओर प्रदक्षिणा के क्रम से पहले कोठे में गणधर और मुनिगण, दूसरे में कल्पवासिनी देवियाँ, तीसरे में आर्यिकाएँ और श्राविकाएँ, चौथे में ज्योतिषी देवांगनाएँ, पाँचवें में व्यन्तर देवांगनाएँ, छठे में भवनवासी देवांगनाएँ, सातवें में भवनवासी देव, आठवें में व्यन्तर देव, नवमें में ज्योतिषी देव, दसवें में कल्पवासी देव, ग्यारहवें में चक्रवर्ती आदि मनुष्य और बारहवें में पशु बैठते हैं।

समवसरण में भव्यजीवों का प्रमाण-भगवान के समवसरण में चक्रायुध को आदि लेकर छत्तीस गणधर थे। बासठ हजार मुनिगण और साठ हजार तीन सौ आर्यिकाएँ, दो लाख श्रावक और चार लाख श्राविकाएँ, असंख्यातों देव-देवियाँ और संख्यातों तिर्र्यंच थे। इस प्रकार बारहगणों के साथ-साथ भगवान ने बहुत काल तक धर्म का उपदेश दिया।

भगवान का मोक्षगमन-जब भगवान की आयु एक माह शेष रह गई, तब वे सम्मेदशिखर पर आए और विहार बंदकर अचलयोग से विराजमान हो गये। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान चतुर्थ शुक्लध्यान के द्वारा चारों अघातिया कर्मों का नाश कर एक समय में लोक के अग्रभाग पर जाकर विराजमान हो गये। वे नित्य, निरंजन, कृतकत्य सिद्ध हो गये। उसी समय इन्द्रादि चार प्रकार के देवों ने आकर निर्वाण कल्याणक की पूजा की और अन्तिम संस्कार करके भस्म से अपने ललाट आदि उत्तमांगों को पवित्र कर स्व-स्वस्थान को चले गये। ये शान्तिनाथ भगवान तीर्थंकर होने से बारहवें भव पूर्व राजा श्रीषेण थे और मुनि को आहारदान देने के प्रभाव से भोगभूमि में गये थे। फिर देव हुये, फिर विद्याधर हुए, फिर देव हुए, फिर बलभद्र हुए, फिर देव हुए, फिर वङ्काायुध चक्रवर्ती हुए। उस भव में इन्होंने दीक्षा ली थी और एक वर्ष का योग धारण कर खड़े हो गये थे, तब इनके शरीर पर लताएँ चढ़ गई थीं, सर्पों ने वामी बना ली थीं, पक्षियों ने घोंसले बना लिये थे और ये वङ्काायुध मुनिराज ध्यान में लीन रहे थे। अनन्तर अहमिन्द्र हुए, फिर मेघरथ राजा हुए, उस भव में इन्होंने दीक्षा लेकर घोर तपश्चरण करते हुए सोलहकारण भावनाओं का चिन्तवन किया था और उसके प्रभाव से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया था। फिर वहाँ से सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुए, फिर वहाँ से आकर जगत् को शांति प्रदान करने वाले सोलहवें तीर्थंकर और पंचम चक्रवर्ती ऐसे शान्तिनाथ भगवान हुए।

उत्तरपुराण में श्री गुणभद्र स्वामी कहते हैं कि इस संसार में अन्य लोगों की बात जाने दीजिए,

श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्र को छोड़कर भगवान तीर्थंकरों में ऐसा कौन है जिसने पूर्व के बारह भवों में से प्रत्येक भव में बहुत भारी वृद्धि प्राप्त की हो!

इसलिये हे विद्वान लोगों! यदि तुम शान्ति चाहते हो तो सबसे उत्तम और सबका भला करने वाले श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्र का निरन्तर ध्यान करते रहो। यही कारण है कि आज भी भव्यजीव शांति प्राप्ति के लिए श्री शान्तिनाथ की आराधना करते हैं।

पुष्पदन्त तीर्थंकर से लेकर सात तीर्थंकरों तक उनके तीर्थकाल में धर्म की व्युच्छित्ति हुई अत: धर्मनाथ तीर्थंकर के बाद पौनपल्य अन्तर पावपल्य काल तक इस भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में धर्म का विच्छेद हो गया अर्थात् हुण्डावसर्पिणी के दोष से उस पावपल्यप्रमाण काल तक दीक्षा लेने वालों का अभाव हो जाने से धर्मरूपी सूर्य अस्त हो गया था, उस समय शान्तिनाथ ने जन्म लिया था। तब से आज तक धर्मपरम्परा अविछिन्नरूप से चली आ रही है इसलिए उत्तरपुराण में भी गुणभद्र स्वामी कहते हैं कि-पुष्पदन्त तीर्थंकर से लेकर सात तीर्थंकरों तक उनके तीर्थकाल में धर्म की व्युच्छित्ति हुई अत: धर्मनाथ तीर्थंकर के बाद पौनपल्य अन्तर पावपल्य काल तक इस भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में धर्म का विच्छेद हो गया अर्थात् हुण्डावसर्पिणी के दोष से उस पावपल्यप्रमाण काल तक दीक्षा लेने वालों का अभाव हो जाने से धर्मरूपी सूर्य अस्त हो गया था, उस समय शान्तिनाथ ने जन्म लिया था। तब से आज तक धर्मपरम्परा अविछिन्नरूप से चली आ रही है इसलिए उत्तरपुराण में भी गुणभद्र स्वामी कहते हैं कि-

‘भोगभूमि आदि कारणों से नष्ट हुआ मोक्षमार्ग यद्यपि ऋषभदेव आदि तीर्थंकरों के द्वारा पुन:-पुन: दिखलाया गया था तो भी उसे प्रसिद्ध अवधि के अन्त तक ले जाने में कोई भी समर्थ नहीं हो सका, तदनन्तर जो शांतिनाथ भगवान ने मोक्षमार्ग प्रकट किया, वही आज तक अखण्डरूप से बाधारहित चला आ रहा है इसलिए इस युग के आद्यगुरू श्री शांतिनाथ भगवान ही हैं क्योंकि उनके पहले जो १५ तीर्थंकरों ने मोक्षमार्ग चलाया था, वह बीच-बीच में विनष्ट होता जाता था।’

जिनके शरीर की ऊँचाई एक सौ आठ हाथ है, जो पंचम चक्रवर्ती हैं और कामदेव पद के धारी है, जिनके हरिण का चिन्ह है, जो भादों वदी सप्तमी को माता के गर्भ में आये, ज्येष्ठ वदी चौदस को जन्म लिया और ज्येष्ठ वदी चौदस को ही दीक्षा ग्रहण किया, पौष शुक्ल दशमी के दिन केवलज्ञानी हुए पुन: ज्येष्ठ वदी चौदस को ही मुक्तिधाम को प्राप्त हुए, ऐसे शांतिनाथ भगवान सदैव हम सबको शांति प्रदान करें।

Shree 1008 Shanti Nath Bhagwan‘s Introduction

Next LordKunthunath Bhagwan
Previous LordDharmanath Bhagwan
SignDeer
FatherRaja Shri Vishwasen Ji
MotherAiradevi
Birth placein Hastinapur
Nirvana placeSammed Shikhar ji
Colorgolden color (like hot gold)
Name of Previous NameKing Shri Megharth Ji
LineageIkshvaku dynasty
Birth Nakshatrain Bharani Nakshatra
Heightforty bow
Agea million years
initiation treeunder the Nandyarvat tree
First DietAhar of Kheer by King Sumitra in Mandarpur Nagar
kshetrapalaMr. Sindhsen, Mr. Mahosan, Mr. Loksen, Mr. Vinay Ket
Shree 1008 Shanti Nath Bhagwan‘s Introduction

Panchkalyanak dates of Shri 1008 Lord Shanti Nath

ConceptionBhadrapada Krishna 7
BirthJyeshtha, Krishna 14
Initiation (Diksha)Jyeshtha, Krishna 14
Attainment of Pure Knowledge (Kevalgyan)Posh, Shukla 10
Liberation (Moksha)Jyeshtha, Krishna 14
Renunciation (Vairagya)Seeing two images of one’s face in the mirror
Panchkalyanak dates of Shri 1008 Lord Shanti Nath

Assimilation/Samavsharan of Shri 1008 of Lord Shanti Nath

YakshaGaruda Dev
YakshiniMahamansi Devi
Ganadharthirty six Ganadhar
Chief GanadharMr. Chakrayudha
Aryikassixty thousand three hundred aryikas
ShravaksTwo lakhs
Shravikasfour lakhs
Chief AryankaGanini Aryika Harisena
Attained salvation through tearsfrom Khadgasana
Which Koot gives salvation?Kundaprabha Koota
Assimilation/Samavsharan of Shri 1008 of Lord Shanti Nath

Introduction to Bhagwan Shantinath

In the Bharatkshetra of this Jambudweep, there is a city named Ratnapur. The king of that city was Shri Shreshen, and he had two queens named Sinhandita and Anindita. These two had two sons named Indrasen and Upendrasen. In the same city, there was a Brahmin girl named Satyabhama, who, considering her husband as a servant’s son, abandoned him and started living with the king to protect her righteousness.

One day, King Shreshen hosted Adityagati and Arinjay, two Charan Munis, at his palace, personally offering them food and obtaining the five auspicious vows. He also established the lifespan of the Northern Kurus’ land, which provides offerings from ten types of wish-fulfilling trees. By giving donations, both queens of the king, as well as Satyabhama with the approval of donation, also secured the lifespan of that excellent land. Indeed, what cannot happen with the congregation of saints?

At one point, Anantmati, a common woman named, arrived with Queen Indrasen’s consort, Shreekanta, which led to affection between Upendrasen and her. This occasion sparked a conflict between the two brothers in the garden. The king proved incapable of stopping this war and, unable to bear the injustice of his beloved sons, sniffed poison flowers and died. Similarly, the queens and Satyabhama also perished by sniffing poison flowers, and in the eastern part of the Dhatakikhand, which is the Uttar Kurupradesh, the king and Sinhandita became a couple while Anindita was known as Arya, and Satyabhama became his wife. Thus, they all began to enjoy the pleasures of the land of enjoyment there.

King Shreshen’s soul ascended from the land of enjoyment to the Saudharma Heaven aboard the Shriprabh Vimana, becoming a divine being named Amitatej. Queen Sinhandita’s soul ascended to the same heaven aboard the Shrinilay Vimana, becoming a goddess named Vidyutprabha. Satyabhama, the Brahmin woman, and Queen Anindita’s souls ascended successively to the Vimlaprabh Vimana, becoming a goddess named Shuklaprabha and a divine being named Vimlaprabh.

King Jvalanajati’s son was Arkakirti. His son Amitatej was born in heaven after the soul of King Shreshen ascended there from the Shriprabh Vimana, from the light of Queen Anantmati. The soul of Sinhandita became Amitatej’s consort, named Jyotiprabha. The soul of Goddess Anindita became Shrivijay, and Satyabhama’s soul became his sister, Sutara. Amitatej observed fasting during all festivals among the Vidhyadharas. As the ruler of both categories, he was the king of all Vidhyadharas. One day, he provided food to the Charan Riddhidhari Muni named Damavar as per the rules, obtaining the five auspicious vows.

At one time, both Amitatej and Shrivijay learned from the Muni that their lifespans were only one month. Knowing this, they handed over their kingdom to their sons, performed Ashtanika Puja with great respect, and near the Chandan forest close to the Muni Nandan, renounced all possessions and embraced the life of renunciation. Eventually, Amitatej, the holder of pure intellect, attained the Ravi Chul Vimana of the thirteenth heaven, and Shrivijay also became a deity in the Swastika Vimana of the same heaven.

After experiencing the pleasures there, the deity named Ravi Chul descended from the Nandyavart Vimana to the city of Prabhakari in the Vatsakavati region of the Eastern Videh country, to King Stimat Sagar and his undefeated consort named Vasundhara, and they had an invincible son named Aparajit. The deity named Manichul also descended from the Swastika Vimana to the same king’s consort named Anantaviry, who had a son named Lakshmipanna. These two brothers became holders of the Balabhadra and Adridhachakra Narayana positions and enjoyed the supreme pleasures of the kingdom for a long time, obtaining the Chakra Ratna by killing the adversary named Damitarini.

At one time, upon the death of Anantaviry, Balabhadra initially became very sad, but upon enlightenment, he handed over the kingdom to Anantasen and embraced the ascetic life near Yashodhara Muniraj. He attained the third stage of enlightenment, became extremely tranquil, and after taking thirty days of asceticism, ascended to the Achyut heaven as Indra.

Here’s the English translation:

Anantavirya Narayana had descended to hell, where Dharnendra enlightened him and initiated him into the path of righteousness. Influenced by his teachings, Anantavirya left hell and, in the region of Bharatkshetra near the northern range of the Vijayardha Mountains, he was born to King Meghavahana’s consort, Meghamalini, as the son named Meghanada. Over time, he took initiation and, at the end of his life, attained the state of Indra in the Achyuta heaven through the power of his penance, experiencing heavenly bliss with Indra.

The soul of Aparajita, who had previously become Indra, initially descended and, in the city of Ratnasanchaya in the Eastern Videh region, was born to Queen Kanakachitra of King Kshemankar Tirthankar as the virtuous soul named Vankayudha. His birth was preceded by rituals such as Garbhadhana. Vankayudha, in his youth, became radiant like the moon in the waxing phase, adorning himself with the prosperity of the kingdom and the beauty of queens Rajyalakshmi and Lakshmimati. The soul of Vankayudha and the soul of Anantavirya (Pratinidhi) became the son named Sahasrayudha. Thus, King Kshemankar ruled over his descendants, grandsons, and so on.

Once, after crowning Vankayudha as king and receiving praise from celestial beings, Kshemankar Tirthankar, accompanied by the Lokantika deities, retired to a hermitage. Under the influence of penance, they delighted the twelve assemblies with divine sounds.

Meanwhile, the Chakraratna was manifested in Vankayudha’s kingdom, and he became a Chakravarti ruler, conquering the six continents and ruling over a universal empire. Once, witnessing the celebration of his grandson’s enlightenment, Vankayudha himself attained self-realization, after which he handed over the kingdom to his son Sahasrayudha and, reaching near Kshemankar Tirthankar, embraced the path of renunciation. After renunciation, he observed the Pratimayoga on Mount Vaibhara for a year. Many serpents had gathered around his feet, seeking refuge, as great beings increase the enemies even in their feet.

At the same time, Vankayudha’s son Sahasrayudha also developed dispassion for some reason. He relinquished his kingdom to his son Shatabali, renounced all desires, and adopted the path of supreme restraint near Muni Pihitasrava. When the one-year period of penance of his father Vankayudha Muni ended, Sahasrayudha Muni approached him. Both father and son practiced severe penance for a long time. Finally, they attained liberation by renouncing their bodies on the top of Mount Vaibhara, and their souls ascended to the Vimana named Soumanasa beneath the Udhrvagriha.

In the eastern Videh region of Jambudvipa lies the country of Pushkalavati, ruled by King Ghanaratha, with his enchanting consort named Manohara. The soul of Vankayudha, after departing from Grahavayu, was born to them as the son named Megharatha. Before his birth, rituals such as Garbhadhana were performed. Megharatha married Priyamitra as his first wife and Manohara as his second wife upon reaching adulthood. His son Drdharatha was born to Sumatidevi. Thus, King Ghanaratha, adorned with all the means of happiness, was enjoying the delights of Indra’s life with his sons and grandsons.

During this time, Priyamitra’s maidservant, Susheṇa, brought a rooster named Ghantunda to show to her. She announced that if others’ roosters could defeat it, she would give a thousand gold coins. Hearing this, another maidservant named Kanchana brought a rooster named Vankatunda. A battle ensued between the two roosters, causing distress for both the roosters and delighting onlookers, but it was not appropriate for the righteous. Therefore, King Ghanaratha, desiring to bring peace to many noble beings, began to inquire about the previous lives of the roosters from his son Megharatha, who was knowledgeable about past lives.

Megharatha explained that there is a city named Ratnapura in the Iravat region of Jambudvipa. There were two brothers named Bhadra and Dhanya. One day, they fought over a bull by the river and died. Later, they fought again, and both brothers died, and then their servants fought, and these roosters were the result. We, the Vidhyadharas, have come here to meet you and increase the power of these roosters through our knowledge. Hearing all this news, those Vidhyadharas revealed their true form, and King Ghanaratha and Prince Megharatha worshiped them and, going near Muni Govardhana, took initiation.

Both of those roosters, upon learning about their past lives, released the bound enmity towards each other, and eventually, with courage, embraced the life of renunciation. They ventured into the forests named Bhutarmana and Devarmana, where they encountered Tamrachula and Kanakachula, the elemental beings.

At that moment, they arrived in the divine city of Pundarikini and, with love, worshipped Prince Megharath, revealing their rooster’s past and humbly requesting to perform some acts of kindness. Finally, the deities, considering their request, led them into a magnificent vehicle filled with various blessings and, traveling through the sky, showed them the entire artificial universe within the Manushottar Mountain, including all the fabricated shrines.

They praised all the artificial temples within the Manushottar Mountain, describing it as the first Bharat Varsha. Upon their return to the grand festival in the city, it is said that those who do not reciprocate the kindness of their benefactors are like living corpses devoid of fragrance, as they don’t reflect the same sense of benevolence.

King Ghanarath was a Tirthankara. One day, he renounced worldly life and attained enlightenment. Meanwhile, Maharaja Megharath achieved the status of asceticism by offering alms to the Siddha named Damvar. Sometimes, he meditated through the night in devotion to Indra during the grand puja in Nandishwar Parva, receiving blessings from the gods.

Upon hearing the teachings of Tirthankara Ghanarath in his assembly, he became detached from the world, including his body and pleasures. Entrusting his son with the kingdom, Dhridharath, along with seven thousand other kings, took initiation and renounced worldly life, embracing asceticism with elevenfold disciplinary practices and liberated himself from the cycle of karma, thus becoming a Tirthankara.

The brave Megharath, along with Dhridharath, took the vow of renunciation on the Mount Nabhatilak, attaining the status of Ahamindra and relinquishing his physical form after a month-long pre-nirvana journey.

Pregnancy and birth of Lord Shantinath

In the capital city of Hastinapur, which was situated in the Kurujangala region, King Vishvasen of the Kashyap lineage ruled. His queen’s name was Airavati. Six months before the conception of Bhagwan Shantinath, under the command of Lord Indra, a shower of jewels began in the courtyard of the queen in Hastinapur, and goddesses like Sri, Hri, and Dhriti became devoted to serving the queen. On the seventh day of the waxing moon in the month of Bhadrapada, under the Bharani Nakshatra, the queen conceived.

At that time, celestial beings descended from heaven to celebrate the auspicious occasion of the conception of the Tirthankar Mahapurush and worshipped the mother and father.

After nine months passed, on the fourteenth day of the dark fortnight of Jyeshtha, during the Yogini Yoga, in the early hours of the morning, the supreme lords of the three realms bestowed a precious gem of a son’s birth upon the queen. At that moment, without anyone playing them, conches, drums, lion roars, and bell sounds began to resonate. King Saudharmendra, riding on Airavata, came to the city along with Indrani and countless other deities, and took the Lord to the Mount Sumeru for his birth ceremony. After the consecration, adorned with numerous ornaments, the Lord was named ‘Shantinath,’ and thus, after returning to Hastinapur and entrusting the parents with the Lord, they bid farewell and departed to their respective realms.

Bhagwan’s lifespan was one lakh years, his body was forty bows high, and he shone like gold. His body was adorned with a thousand eight auspicious symbols like flags, festoons, conch shells, discs, etc. He had a son named Chakrayudha from Queen Yashaswati of Vishvasen. While playing with the divine children, Bhagwan Shantinath, along with his younger brother Chakrayudha, was growing up. When Bhagwan reached the age of twenty-five thousand years, King Vishvasen surrendered his kingdom to him. As the Lord passed twenty-five thousand years and beyond, the Chakravarti Ratna, manifesting the glory of his empire in his weapons hall, emerged. Thus, with the appearance of the Chakravarti Ratna, the fourteen Ratnas and the nine Nidhis manifested. These included various treasures like horses, elephants, excellent warriors, and numerous vidyadharas and eighty thousand Mleccha kings. The nine Nidhis were inspired by merit and brought to the confluence of rivers and oceans by the gods.

After the manifestation of the Chakravarti Ratna, the Lord, following proper rituals, conquered the six directions and ruled over this Bharat Varsha as a Chakravarti. What description can be given of the happiness and prosperity of that land where Bhagwan Shantinath himself was nurturing the people? In this way, with Bhagwan taking care of the welfare of the subjects, there were sixty-four thousand queens, thirty-two thousand crowned kings serving him, and thirty-two thousand yakshas waving fans for him. Chakravartis have three crore relatives, eighteen crore horses, eighty-four lakh elephants, three crore excellent heroes, numerous vidyadharas, and eighty-eight thousand cities, sixteen thousand fields, twenty-four thousand forts, four thousand mansions, and forty thousand villages. There were also nine treasures provided by the gods, such as time, great time, fortune, honor, conch, lotus, serpent, discus, and various gems. These Chakravarti kings enjoyed the pleasures of ten types, such as palaces, jewels, treasuries, armies, food, entertainment, beds, thrones, vehicles, and drama. Thus, adorned with numerous sons and daughters, Bhagwan Shantinath enjoyed the pleasures of his Chakravarti reign, along with being a Tirthankar and a Chakravarti.

Penance of Lord Shantinath

When Bhagwan had spent twenty-five thousand years in the position of emperor, there came a time when, while adorning himself in the chamber of adornments, he saw his own reflection in the mirror. At that moment, he attained self-realization and remembered his past lives, thus becoming detached while contemplating the nature of the world, the body, and pleasures. At that time, celestial beings arrived and worshipped him with many praises. Later, Saudharma and other gods, including Indra, were present along with all the divine beings. Bhagwan then crowned the son of Narayana and gave appropriate instructions to all his relatives.

After Bhagwan’s renunciation ceremony, Indra anointed him with the title “Sarvarthsiddhi” and placed him in a palanquin named “Sarvarthsiddhi” and entered the Sahasramra forest near Hastinapur. On the fourteenth day of the dark fortnight of Jyeshtha, under the Bharani Nakshatra, following the rule of Bela, Bhagwan took the Pancamusti (Fivefold Vow) and, chanting “Namo Siddhebhya,” he accepted the Jaineshwari Diksha and attained omniscience as soon as he became stable in meditation, renouncing all possessions and attachments.

Regarding Bhagwan’s food, King Sumitra of Mandirapur offered Bhagwan Shantinath a meal of kheer, obtaining the glory of the fivefold vow. In this way, Bhagwan spent sixteen years practicing austerities successively.

Only knowledge and salvation of Lord Shantinath

The Samavasarana was a magnificent circular platform towering five thousand bows high from the earth. Stairs began at an arm’s height above the ground, spaced one bow’s length apart and numbering twenty thousand. Adorned with four Manastambhas (pillar of honor) in each direction and surrounded by lakes, the Samavasarana showcased the grandeur of spiritual life. It contained various enclosures, including lakes, flower gardens, theaters, groves, vedikas (altars), flags, and chambers for celestial beings, ascetics, and humans. Within its confines, Lord Shantinath’s teachings illuminated the path to liberation for countless beings.

Description of Samavasarana: The Samavasarana was five thousand bows high from the surface of the earth, with its steps beginning at a height of one hand above the ground. These steps were one hand wide, and there were twenty thousand of them. The Samavasarana was circular in shape. At its center, after the platform, there were four manastambhas (cosmic pillars), one in each direction. Surrounding each manastambha, there was a lake. Next was a pure water-filled moat, followed by a flower garden. Beyond that was the first enclosure, flanked on both sides by two dance halls. After that was the second enclosure, which contained a forest of Ashoka, mango, champak, and seven-leafed trees. Following that was a pavilion, and then rows of flags. Next was the second enclosure, which included a forest of wish-fulfilling trees along with a pavilion. Then came the stupas, followed by rows of buildings. After the buildings, there was a crystal-studded third enclosure. Inside it were twelve assemblies of humans, gods, and ascetics. Next was the pedestal, upon which the Arhats resided on lotus thrones with their mouths four fingers below their lower lips. The Lords faced either east or north but could be seen from all four directions due to their extraordinary nature. Before circumambulating the Samavasarana, in the first quadrant were Ganadhara and monks, in the second were celestial nymphs, in the third were Aryikas (nun aspirants) and Sravikas (laywomen), in the fourth were divine astrologers, in the fifth were intermediate celestial nymphs, in the sixth were celestial nymphs who had attained the state of householder, in the seventh were celestial nymphs who were householders, in the eighth were intermediate celestial beings, in the ninth were celestial beings who were astrologers, in the tenth were celestial beings who were householder, in the eleventh were chakravartins and other human beings, and in the twelfth were animals.

The Samavasarana hosted a grand assembly of beings: there were thirty-six Ganadharas, leading with Chakrayudha. Additionally, there were sixty-two thousand monks, sixty-three thousand Aryikas (nun aspirants), two hundred thousand laymen, and four hundred thousand laywomen. Countless gods and goddesses, as well as innumerable beings from the celestial and hellish realms, were also present. In this manner, along with the twelve categories of beings, the Lord imparted teachings of Dharma for a long time.

The liberation of the Lord – When only one month of the Lord’s life remained, he ascended to the summit of Sammed Shikhar and, relinquishing all activities, attained the state of eternal liberation. On the fourteenth day of the dark half of the month of Jyeshtha, the Lord destroyed the four inauspicious karmas through the fourth white meditation and manifested himself simultaneously in the upper part of the universe. He became eternal, pure, and free from all impurities. At that moment, various types of deities, including Indra, worshipped the auspicious nirvana kalyanak and performed the final rites, sanctifying their superior limbs with ashes before departing to their respective abodes. These Lord Shantinath Bhagwan were the twelfth Tirthankar and in their previous life, they were the King Srisen. Because of the influence of giving food to a monk, they went to heaven, then became deities, then Vidhyadharas, then deities, then Balbhadra, then deities, then Vankkaya Chakravarti. In that life, they took initiation and stood for a year of penance, then creepers grew on their bodies, serpents made their heads as their abodes, birds built nests, and these Vankkaya Muniraj remained absorbed in meditation. Subsequently, they became Ahmin Indra, then King Megharath, and in that life, they meditated on the sixteen karanas and, influenced by them, bound the nature of Tirthankar. Then they attained omniscience there and from there came as the sixteenth Tirthankar who provides peace to the world and became the fifth Chakravarti.

In the Uttar Purana, Shri Gunbhadra Swami says that in this world, let others speak, except for Lord Shantinath Jina, who among the Tirthankaras has attained significant growth in each of the twelve previous existences!

Therefore, O learned people! If you desire peace, then continuously meditate on Shri Shantinath Jina, who is the best and benevolent to all. This is why even today, those seeking glorious lives worship Shri Shantinath for the attainment of peace.

From the time of Tirthankar Pushpadanta up to the seventh Tirthankar, there was a decline in righteousness during their eras. Therefore, after Tirthankar Dharmanath, until the time of Pavapalya, there was a separation of righteousness in the Aryakhand of Bharatkshetra due to the fault of HunDavasarpini. During that period, there was a lack of those who undertook the vows, leading to the disappearance of the sun-like righteousness. It was during this time that Lord Shantinath was born. Since then, the tradition of righteousness has been continuous and unbroken. That’s why even in the Uttar Purana, Shri Gunbhadra Swami says:

“From Tirthankar Pushpadanta up to the seventh Tirthankar, there was a decline in righteousness during their eras. Therefore, after Tirthankar Dharmanath, until the time of Pavapalya, there was a separation of righteousness in the Aryakhand of Bharatkshetra due to the fault of HunDavasarpini. During that period, there was a lack of those who undertook the vows, leading to the disappearance of the sun-like righteousness. It was during this time that Lord Shantinath was born. Since then, the tradition of righteousness has been continuous and unbroken.”

Even though the path to liberation was repeatedly revealed by Tirthankars like Rishabhdev due to the destruction caused by the realms of indulgence and other factors, no one was capable of leading it to the end of the renowned period. Subsequently, what Lord Shantinath manifested as the path to liberation has been continuously unobstructed. That’s why in this era, the first Guru is Lord Shantinath, because the path to liberation initiated by the previous 15 Tirthankars would intermittently perish.

He, whose height is one hundred and eight hands, who is the fifth Chakravarti and holds the position of the lord of desires, whose symbol is a deer, who was conceived on the seventh day of the bright half of Bhadrapada, born on the fourteenth day of the bright half of Jyeshtha, and took initiation on the same day, who attained omniscience on the tenth day of the bright half of Poush, and attained liberation on the fourteenth day of the bright half of Jyeshtha again, may such Lord Shantinath always bestow peace upon us.

You can explore the fascinating stories of all Jain 24 Tirthankaras, Exploring Jain Symbols on the Jain Sattva website. Delve into their lives and teachings to gain insights into Jain philosophy and spirituality.

Author: Admin
Jain Sattva writes about Jain culture. Explore teachings, rituals, and philosophy for a deeper understanding of this ancient faith.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *