अंगविज्जा प्रकीर्णक का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह मनुष्य को स्थिर भाग्य के विचार में नहीं बाँधता। ग्रंथ में बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि शारीरिक लक्षण केवल प्रवृत्तियों और संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं, परंतु उनका अंतिम परिणाम मनुष्य के पुरुषार्थ और आचरण पर निर्भर करता है।
ग्रंथकार बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति में कुछ ऐसे लक्षण पाए जाते हैं जिन्हें अशुभ माना गया है, तो भी वह अपने संयम, विवेक, अभ्यास और जीवन-शैली के परिवर्तन से उन्हें निष्प्रभावी कर सकता है। इसी प्रकार शुभ माने जाने वाले लक्षण भी तब तक फलदायक नहीं होते, जब तक व्यक्ति उचित आचार और सजगता के साथ जीवन न जिए।
अंगविज्जा में परिवर्तनशीलता पर विशेष बल दिया गया है। यह माना गया है कि शरीर और मन दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं, और मानसिक परिवर्तन का प्रभाव शारीरिक लक्षणों पर भी पड़ता है। इसलिए आत्म-सुधार केवल बाहरी संकेतों को पढ़ने से नहीं, बल्कि अंतर्मुखी साधना और नैतिक अनुशासन से संभव होता है।
यह दृष्टि जैन दर्शन की उस मूल भावना के अनुरूप है, जिसमें कर्म-सिद्धांत के साथ पुरुषार्थ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। मनुष्य अपने कर्मों के बंधन में अवश्य है, परंतु वही मनुष्य अपने पुरुषार्थ से उन बंधनों को शिथिल या समाप्त भी कर सकता है।
इस प्रकार अंगविज्जा प्रकीर्णक भविष्य को जड़ रूप में स्वीकार नहीं करता, बल्कि मनुष्य को यह संदेश देता है कि स्वयं को पहचानकर स्वयं को बदलना ही सच्चा ज्ञान है।
लक्षण संकेत देते हैं, पर जीवन की दिशा मनुष्य का पुरुषार्थ ही तय करता है।
अंगविज्जा जैसे ग्रंथ Jain philosophy की उस व्यावहारिक सोच को दर्शाते हैं, जहाँ आत्मज्ञान और विवेक को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यदि आप जैन दर्शन और आगमिक परंपरा पर आधारित ऐसी ही विचारपूर्ण कथाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी Jain philosophy: और Jain Stories: श्रेणियाँ अवश्य देखें, जहाँ जैन ग्रंथों से प्रेरित अनेक प्रामाणिक और शिक्षाप्रद कथाएँ एकत्रित रूप में उपलब्ध हैं।
