अंगविज्जा प्रकीर्णक में शारीरिक लक्षणों के संदर्भ में शुभ और अशुभ संकेतों का उल्लेख मिलता है, परंतु यह उल्लेख किसी कठोर या अंतिम निर्णय के रूप में नहीं किया गया है। ग्रंथकार का उद्देश्य व्यक्ति को भय या अंधविश्वास में बाँधना नहीं, बल्कि उसे संकेतों को समझकर विवेकपूर्ण दृष्टि अपनाने की प्रेरणा देना है।
ग्रंथ में यह स्पष्ट किया गया है कि शुभ या अशुभ कहे जाने वाले लक्षण केवल संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। कोई भी लक्षण अपने आप में पूर्ण फलदायक नहीं होता। उसके साथ व्यक्ति का आचार, संयम, पुरुषार्थ और मानसिक स्थिति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अंगविज्जा यह भी बताती है कि समय, परिस्थिति और जीवन-शैली के परिवर्तन से शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन संभव है। इसलिए किसी एक संकेत के आधार पर व्यक्ति के पूरे जीवन का निर्णय कर देना उचित नहीं माना गया है। यह दृष्टिकोण जैन दर्शन की अनेकांत और विवेकपूर्ण सोच के अनुरूप है।
ग्रंथकार बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि अंगविज्जा को भविष्यवाणी का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण का माध्यम समझना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति किसी अशुभ संकेत को देखकर अपने आचार और व्यवहार में सुधार करता है, तो वही इस ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य है।
इस प्रकार शुभ–अशुभ संकेतों की व्याख्या अंगविज्जा में सीमित, सापेक्ष और सुधारोन्मुख रूप में की गई है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन को जागरूकता और उत्तरदायित्व के साथ जी सके।
संकेत दिशा दिखाते हैं, निर्णय मनुष्य के विवेक और पुरुषार्थ से ही होते हैं।
अंगविज्जा जैसे ग्रंथ Jain philosophy की उस व्यावहारिक सोच को दर्शाते हैं, जहाँ आत्मज्ञान और विवेक को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यदि आप जैन दर्शन और आगमिक परंपरा पर आधारित ऐसी ही विचारपूर्ण कथाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी Jain philosophy: और Jain Stories: श्रेणियाँ अवश्य देखें, जहाँ जैन ग्रंथों से प्रेरित अनेक प्रामाणिक और शिक्षाप्रद कथाएँ एकत्रित रूप में उपलब्ध हैं।
