Introduction to Shree 1008 Malli Nath Bhagwan: 19th Tirthankara of Jainism

Introduction to Shree 1008 Malli Nath Bhagwan 19th Tirthankara of Jainism

श्री मल्लिनाथ भगवान का परिचय

अगले भगवानमुनिसुव्रतनाथ भगवान
पिछले भगवानअरहनाथ भगवान
चिन्हकलश चिन्ह
पिताश्री राजा कुम्भराज
मातामहादेवी (प्रभावती)
जन्म स्थानमिथला नगरी में
निर्वाण स्थानश्री सम्मेद शिखर जी
रंगनील वर्ण
पूर्व पर्याय का नामवैश्रवण नाम के राजा थे
वंशइक्ष्वाकु वंश
दीक्षा पालकीजयंत नामक पालकी
अवगाहनापच्चीस धनुष ऊंचाई
आयुपचपन हजार वर्ष
दीक्षा वृक्षअशोक वृक्ष
प्रथम आहारमिथला नगरी में श्री नंदिषेण ने खीर का आहार
क्षेत्रपालश्री क्षितिप जी, श्री भवय जी, श्री क्षांतिय जी, श्री क्षेत्रय जी।
श्री मल्लिनाथ भगवान का परिचय

श्री 1008 मल्लिनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

गर्भचैत्र शुक्ला एकम
जन्ममगसिर शुक्ला ग्यारस
दीक्षामगसिर शुक्ला ग्यारस
केवलज्ञानपौष कृष्ण दोज
मोक्षफागुन शुक्ल 5
वैराग्यअधुवादि भावनाओं के चिंतवन करने
श्री 1008 मल्लिनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

श्री 1008 मल्लिनाथ भगवान का समवशरण

शासन यक्षकुबेर यक्ष
शासन देवीउपराजिता देवी
गणधरअट्ठाईस गणधर
प्रमुख गणधरविशाख
आर्यिकायेंपचपन हजार आर्यिकायें
श्रावकएक लाख श्रावक
श्राविकायेंतीन लाख श्राविकायें
प्रमुख आर्यिका मधु सेना आर्यिका
आंसन से मोक्ष गयेखड़गासान 
कौन से कूट से मोक्षसम्वल कूट
श्री 1008 मल्लिनाथ भगवान का समवशरण

मल्लिनाथ भगवान का परिचय

श्रीनाग पर्वत पर विराजमान श्रीनाग मुनिराज के पास जाकर धर्मामृत का पान करके जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर लेता है । अनेक प्रकार से तपश्चरण करते हुए ग्यारह अंगों का अध्ययन किया। सोलहकारण भावनाओं के चिन्तवन से तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कर लिया । अन्त में संन्यास विधि से प्राण विसर्जन करके अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र पद को प्राप्त कर लिया। वहाँ पर एक हाथ का ऊँचा शरीर था और तेंतीस सागर प्रमाण आयु थी ।

मल्लिनाथ भगवान का गर्भ और जन्म

इसी भरतक्षेत्र के बंगदेश में मिथिला नगरी के स्वामी इक्ष्वाकुवंशी काश्यपगोत्रीय ‘कुम्भ’ नाम के महाराज धर्मनीतिपूर्वक राज्य संचालन कर रहे थे। उनकी रानी का नाम ‘प्रजावती’ था । अहमिन्द्र की आयु छह मास की अवशिष्ट रहने पर ही इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने माता के आँगन में रत्नवर्षा प्रारम्भ कर दी थी । चैत्र T शुक्ला प्रतिपदा के दिन सोलहस्वप्नविलोकनपूर्वक रानी प्रजावती ने अहमिन्द्र देव को गर्भ में धारण किया और मगशिर सुदी एकादशी के दिन अश्विनी नक्षत्र में पूर्ण चन्द्र सदृश पुत्ररत्न को जन्म दिया। सौधर्म इन्द्र ने समस्त देवों सहित महावैभव के साथ सुमेरू पर्वत पर तीर्थंकर बालक का जन्माभिषेक किया। अनन्तर ‘मल्लिनाथ’ नामकरण करके मिथिला नगरी में जाकर महामहोत्सवपूर्वक माता – पिता को सौंप दिया ।

मल्लिनाथ भगवान का तप

अरहनाथ तीर्थंकर के बाद एक हजार करोड़ वर्ष बीत जाने पर भगवान मल्लिनाथ हुए हैं। उनकी आयु भी इसी में शामिल थी । पचपन हजार वर्ष की उनकी आयु थी एवं पच्चीस धनुष ऊँचा सुवर्ण वर्णमय शरीर था । कुमार काल के सौ वर्ष बीत जाने पर एक दिन भगवान मल्लिनाथ ने देखा कि समस्त नगर हमारे विवाह के लिए सजाया गया है। सर्वत्र मनोहर वाद्य बज रहे हैं। उसे देखते ही उन्हें पूर्व जन्म के सुन्दर अपराजित विमान का स्मरण आ गया। वे विचार करने लगे कि कहाँ तो वीतरागता से उत्पन्न हुआ प्रेम और उससे प्रकट हुई महिमा और कहाँ सज्जनों को लज्जा उत्पन्न करने वाला यह विवाह! उसी समय लौकांतिक देवों ने आकर भगवान की स्तुति की। अनन्तर सौधर्म आदि इन्द्रों ने देवों सहित आकर ‘जयन्त’ | नामक पालकी पर भगवान को विराजमान किया और श्वेतवन के उद्यान में पहुँचे। वहाँ पर भगवान ने मगसिर सुदी एकादशी के दिन अश्विनी नक्षत्र में सायंकाल के समय सिद्ध साक्षीपूर्वक बेला का नियम लेकर तीन सौ राजाओं के साथ संयम धारण कर लिया एवं अन्तर्मुहूर्त में ही मन:पर्यय ज्ञान को प्राप्त कर लिया। तीसरे दिन पारणा के लिये आये, तब मिथिलानगरी के नंदिषेण राजा ने आहारदान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त कर लिये ।

मल्लिनाथ भगवान का केवलज्ञान और मोक्ष

छद्मस्थ अवस्था के छह दिन व्यतीत हो जाने पर भगवान ने बेला का नियम लेकर उसी श्वेतवन में अशोक वृक्ष के नीचे ध्यान लगाया । पौष वदी दूज के दिन अश्विनी नक्षत्र में प्रातःकाल चार घातिया कर्मों का नाश करके भगवान केवलज्ञानी हो गये। उनके समवसरण में विशाख आदि को लेकर अट्ठाईस गणधर थे। चालीस हजार महामुनिराज, बन्धुसेना आदि पचपन हजार आर्यिकाएँ, एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ थीं। भगवान ने बहुत काल तक आर्यखंड में विहार किया। एक मास की आयु के अवशेष रह जाने पर वे भगवान सम्मेदाचल पर पहुँचे। वहाँ पाँच हजार मुनियों के साथ योग निरोध किया और फाल्गुन शुक्ला पंचमी के दिन भरणी नक्षत्र में संध्या के समय लोक के अग्रभाग पर विराजमान हो गये। उसी समय देवों ने आकर भगवान का निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया।

Shree 1008 Malli Nath Bhagwan‘s Introduction

Next LordLord Munisuvrata
Previous LordLord Aranath
SignKalasha
FatherKing Kumbharaja
MotherQueen Mahadevi (Prabhavati)
Birth placeMithila City
Nirvana placeSammed Shikhar ji
ColorBlue
Name of Previous NameVaishravana
LineageIkshvaku
initiation palanquinJayant
HeightTwenty Five bows
AgeFifty-five thousand years
initiation treeAshoka
First DietRice pudding(Kheer) by Sri Nandishen in Mithila
kshetrapalaSri Kshitip, Sri Bhavya, Sri Kshanti, Sri Kshetray
Shree 1008 Malli Nath Bhagwan‘s Introduction

Panchkalyanak dates of Shree 1008 Lord Malli Nath

ConceptionChaitra Shukla Ekam
BirthMagasir Shukla Gyaras
Initiation (Diksha)Magasir Shukla Gyaras
Attainment of Pure Knowledge (Kevalgyan)Paush Krishna Doj
Liberation (Moksha)Phagun Shukla 5
Renunciation (Vairagya)to reflect on unreal feelings
Panchkalyanak dates of Shri 1008 Lord Malli Nath

Assimilation/Samavsharan of Shree 1008 of Lord Malli Nath

YakshaKuber Yaksha
YakshiniUprajita Devi
Ganadhartwenty eight Ganadhar
Chief GanadharVishakh
Aryikasfifty-five thousand Aryankas
Shravaksone lakh listeners
Shravikasthree lakh
Chief AryankaMadhu Sena Aaryika
Attained salvation through tearsKhadgasan
Which Koot gives salvation?samwal Kut
Assimilation/Samavsharan of Shri 1008 of Lord Malli Nath

Introduction of shree 1008 of Lord Malli Nath

On the mountain of Shrinag, near Lord Shrinag Muniraj, one attains Jaineshwari Diksha after drinking the nectar of righteousness. He studies eleven limbs through various ascetic practices. By contemplating on the sixteen causes, he binds the nature of a Tirthankar. Finally, through the ritual of renunciation, he attains the position of Ahmindra in the Unutrar Vimana. There, he had a body towering one hand and a lifespan of thirty-three oceans.

Conception and Birth of Shree 1008 of Lord Malli Nath

In the kingdom of Mithila in the land of Bangadesh, Maharaja Kumbh, of the Ikshvaku dynasty and Kashyap lineage, ruled wisely. His queen was named Prajavati. At the age of six months, upon the remaining lifespan of Indra’s command, Kubera initiated a shower of gems in the queen’s courtyard. On the first day of Chaitra Shukla Pratipada, Queen Prajavati conceived Ahmindra Dev, and on the Ekadashi of Margashirsha Sud, under the Ashwini Nakshatra, gave birth to a son resembling a full moon. Indra, along with all the gods, performed the auspicious birth ceremony of the Tirthankar on Mount Sumeru. Subsequently, named Mallinath, the newborn was ceremoniously presented to the parents in Mithila City.

Penance of Shree 1008 Malli Nath Bhagwan

After one billion years following Lord Aranath’s reign, Lord Mallinath ascended. His age and stature matched the previous Tirthankar. He observed a grand wedding setup in the city one day, triggering memories of his past life’s unblemished vimana. Contemplating the contrast between worldly love and detachment, divine beings praised him. Later, Indra and others welcomed him onto a palanquin named ‘Jayant’ and escorted him to the gardens of Shvetvan. There, on the eleventh day of Margashirsha Sud, under Ashwini Nakshatra, he observed rigorous austerity with three hundred kings, attaining omniscience within moments. On the third day, King Nandishen of Mithila offered alms, completing his vows.

Shree 1008 Malli Nath Bhagwan Kevalgyana and Moksha

After six days in the concealed state, the Lord meditated under an Ashoka tree in the same Shvetvan. On the second day of Paush Vad, under Ashwini Nakshatra, he attained omniscience by purging four ghātiyā karmas. His assembly included 28 Ganadharas, 40,000 Muni kings, and numerous Aryikas, Shravaks, and Shravikas. He resided in Aryakhand for an extensive period before reaching Sammed Shikhar. There, alongside 5,000 Munis, he achieved yoga cessation. On Falgun Shukla Panchami, during twilight under Bharani Nakshatra, he attained nirvana, celebrated by celestial beings.

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Author: Admin
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