Introduction to Shree 1008 Munisuvrata Swami Bhagwan: 20th Tirthankara of Jainism

Introduction to Shree 1008 Munisuvrata Swami Bhagwan 20th Tirthankara of Jainism

श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान का परिचय

अगले भगवाननमिनाथ भगवान
पिछले भगवानमल्लिनाथ भगवान
चिन्हकछुआ चिन्ह 
पिताराजा श्री सुमित्र जी
मातामहारानी श्रीमती पद्मावती (सोमावती)
जन्म स्थानराजग्रही नगर में
निर्वाण स्थानश्री सम्मेद शिखर जी
रंगश्याम वर्ण
पूर्व पर्याय का नामराजा श्री हरिवर्मा
वंशहरि वंश में। (यादव वंश)
दीक्षा पालकीअपराजिता पालकी
अवगाहनाबीस धनुष की
आयुतीस हजार वर्ष की
दीक्षा वृक्षचम्पक वृक्ष के नीचे
प्रथम आहारराजगृही नगर में श्री वृषभ सेन ने खीर का आहार
क्षेत्रपालश्री तनदराज, श्री गुणराज, श्री कल्याण राज, श्री भव्यराज
श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान का परिचय

श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

गर्भश्रावण कृष्णा द्वितीया
जन्मबैशाख कृष्णा बारस
दीक्षावैशाख कृष्णा दसवीं
केवलज्ञानवैशाख कृष्णा नौमी
मोक्षफाल्गुन कृष्णा 12
वैराग्यअपने प्रधान हाथी के जाति स्मरण को देखकर
श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान का समवशरण

शासन यक्षवरूण यक्ष
शासन देवीबहुरूपिणी देवी यक्षी
गणधरअठारह गणधर
प्रमुख गणधरश्री मल्लिनाम के गणधर
आर्यिकायेंपचास हजार आर्यिकायें
श्रावकएक लाख
श्राविकायेंतीन लाख
प्रमुख आर्यिका गणिनी आर्यिका प्रमुख पूर्वदत्ता
आंसन से मोक्ष गयेखड़गासन
कौन से कूट से मोक्षनिर्जर कूट
श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान का समवशरण

मुनिसुव्रतनाथ भगवान का परिचय

इसी भरतक्षेत्र के अंग देश के चम्पापुर नगर में हरिवर्मा नाम के राजा थे। किसी एक दिन वहाँ के उद्यान में ‘अनन्तवीर्य’ नाम के निर्ग्रन्थ मुनिराज पधारे। उनकी वन्दना करके राजा ने धर्मोपदेश श्रवण किया और तत्क्षण विरक्त होकर अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण कर लिया। उन्होंने गुरू के समागम से ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावनाओं का चिन्तवन कर तीर्थंकर गोत्र का बंध किया ।
चिरकाल तक तपश्चरण करते हुए अन्त में समाधिपूर्वक मरण करके प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हो गये। वहाँ बीस सागर की आयु थी और उनका साढ़े तीन हाथ का ऊँचा शरीर था।

मुनिसुव्रतनाथ भगवान का गर्भ और जन्म

इसी भरतक्षेत्र के मगध देश में राजगृह नाम का नगर है। उसमें हरिवंश – शिरोमणि, काश्यपगोत्रीय, सुमित्र महाराज राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम सोमा था । श्रावण कृष्णा द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में रानी ने उन प्राणत इन्द्र को गर्भ में धारण किया, अनुक्रम से नव मास के बाद रानी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया। देवों ने भगवान का जन्मोत्सव मनाकर ‘मुनिसुव्रत’ नाम प्रकट किया। मल्लिनाथ के बाद चौवन लाख वर्षों के बीत जाने पर इनका जन्म हुआ। इनकी आयु तीस हजार वर्ष एवं ऊँचाई बीस धनुष की थी ।

मुनिसुव्रतनाथ भगवान का तप

कुमार काल के सात हजार पाँच सौ वर्ष बीत जाने पर भगवान का राज्याभिषेक हुआ । राज्य अवस्था में प्रभु के पन्द्रह हजार वर्ष बीत जाने पर किसी दिन गर्जती हुई घन-घटा के समय उनके यागहस्ती ने वन का स्मरण कर खाना-पीना बन्द कर दिया। उस समय |महाराज मुनिसुव्रतनाथ अपने अवधिज्ञान से उस हाथी के मन की सारी बातें जान गये। वे कुतूहल से भरे मनुष्यों के सामने हाथी का पूर्वभव कहने लगे कि यह हाथी पूर्वभव में तालपुर नगर का नरपति राजा था। अपने उच्चकुल के अभिमान सहित इसने अशुभलेश्याओं से सहित, मिथ्याज्ञानी, पात्र-अपात्र की परीक्षा से रहित किमिच्छिक दान दिया था, उसके फलस्वरूप यह हाथी हुआ है। इस समय भी यह अपने अज्ञान आदि का स्मरण न करता हुआ वन का स्मरण कर रहा है। इतना सुनते ही उस हाथी को अपने पूर्वभव का स्मरण हो गया और उसने प्रभु से संयमासंयम ग्रहण कर लिया। इसी निमित्त से प्रभु को वैराग्य हो गया और लौकांतिक देवों द्वारा पूजा को प्राप्त भगवान अपराजित नामक पालकी पर बैठकर नीलवन में पहुँचे। वहाँ बेला के उपवास का नियम लेकर वैशाख कृष्ण दशमी के दिन श्रवण नक्षत्र में सायंकाल के समय एक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो गये। उनकी प्रथम पारणा का लाभ राजगृह नगर के राजा वृषभसेन को प्राप्त हुआ था।

मुनिसुव्रतनाथ भगवान का केवलज्ञान और मोक्ष

प्रभु के छद्मस्थ अवस्था के ग्यारह मास व्यतीत हो गये, तब वे उसी नीलवन में पहुँचे और बेला के नियम से सहित ध्यानारूढ़ हो गये। वैशाख शुक्ला दशमी के दिन श्रवण नक्षत्र में शाम के
समय प्रभु को केवलज्ञान प्रकट हो गया। भगवान के समवसरण में मल्लि को आदि लेकर अठारह गणधर थे, तीस हजार मुनिराज, पुष्पदन्ता को आदि लेकर पचास हजार आर्यिकाएँ, एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ थीं। भगवान एक मास की आयु | अवशेष रहने पर विहार बन्द करके सम्मेदशिखर पर जा पहुँचे तथा एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमायोग में लीन हो गये। फाल्गुन कृष्णा द्वादशी के दिन रात्रि के पिछले भाग में शरीर से रहित अशरीरी सिद्ध हो गये। इन मुनिसुव्रत भगवान को मेरा नमस्कार होवे ।

Shree 1008 MuniSuvrata Bhagwan‘s Introduction

Next LordNaminath Bhagwan
Previous LordMallinath Bhagwan
SignTurtle symbol
FatherRaja Shri Sumitra ji
MotherQueen Smt. Padmavati (Somavati)
Birth placein Rajgrahi Nagar
Nirvana placeSammed Shikhar ji
Colorshyaam varn
Name of Previous NameRaja Shri Harivarma
LineageIn Hari dynasty. (Yadav dynasty)
initiation palanquinAparajita Palki
Heighttwenty bows
Agethirty thousand years old
initiation treeunder the champak tree
First DietMr. Vrishabh Sen served kheer diet in Rajgrihi Nagar.
kshetrapalaMr. Tandaraj, Mr. Gunraj, Mr. Kalyan Raj, Mr. Bhavyaraj
Shree 1008 MuniSuvrata  Bhagwan‘s Introduction

Panchkalyanak dates of Shree 1008 Lord MuniSuvrata 

ConceptionShravan Krishna 2
Birthbaishakh krishna 12
Initiation (Diksha)vaishakha krishna 10
Attainment of Pure Knowledge (Kevalgyan)Vaishakh Krishna 9
Liberation (Moksha)Falgun Krishna 12
Renunciation (Vairagya)Seeing the caste memory of our chief elephant
Panchkalyanak dates of Shri 1008 Lord MuniSuvrata 

Assimilation/Samavsharan of Shree 1008 of Lord MuniSuvrata 

YakshaVarun Yaksha
YakshiniBahurupini Devi
GanadharEighteen Gandhar
Chief GanadharGandharva of Sri Mallinam
AryikasFifty thousand
ShravaksOne lakh
ShravikasThree Lakh
Chief AryankaGanini Aryika Chief Purvadatta
Attained salvation through tearsKhargasana
Which Koot gives salvation?Nirjar Kut
Assimilation/Samavsharan of Shri 1008 of Lord MuniSuvrata 

Introduction of shree 1008 of Lord MuniSuvrata 

In the city of Champapur in the Bharatkshetra, there was a king named Harivarma. One day, a Jain monk named Anantaviryaraja arrived in the royal gardens. After paying respects to him, the king listened to his teachings and immediately became disenchanted with worldly affairs. He then handed over the kingdom to his eldest son and embraced asceticism, practicing self-discipline along with many other kings.

He studied eleven parts of Jainism at gatherings of sages and contemplated on the sixteen qualities such as purity of vision, etc., eventually attaining liberation after leading a life of austerity. At the end of his life, he achieved salvation and ascended to heaven, becoming Indra. He lived for twenty sagar years and had a body three and a half cubits tall.

Conception and Birth of Shree 1008 of Lord MuniSuvrata 

In the Magadha region of Bharatkshetra, there is a city named Rajgriha. In that city, King Harivansha-Shiromani, of the Kashyapa lineage, ruled along with Queen Soma. On the second day of the dark half of the month of Shravana, under the Shravana constellation, the queen conceived the future Indra in her womb. After nine months, she gave birth to a son named Munisuvrata. The gods celebrated his birth by the name of ‘Munisuvrata.’

After thirty-four lakh years following Mallinath, he was born. He lived for thirty thousand years and had a height of twenty bows.

Penance of Shree 1008 MuniSuvrata  Bhagwan

After seven thousand five hundred years of Prince Kal’s life passing, the Lord was crowned. After fifteen thousand years in the royal state, during a stormy and thunderous time, his royal elephant stopped eating and drinking, remembering the forest. At that moment, King Munisuvratanatha, with his clairvoyance, understood all the thoughts of the elephant. He began narrating the elephant’s past life before the curious crowd, revealing that the elephant was once a king of Talapura city in its previous life. Despite his high lineage, he had performed acts of charity without attachment, free from false beliefs and discrimination between worthy and unworthy recipients. As a result of those actions, he was reborn as the elephant.

Even at that moment, the elephant, without recalling its ignorance, remembered the forest. Hearing this, the elephant recalled its past life and took a vow of self-restraint in front of the Lord. This incident led to the Lord’s detachment, and he, along with the celestial gods, proceeded to the Neelavana forest, riding on a palanquin called Aparajita, attained through worship by worldly gods. Observing the rules of fasting during the time of Bela, on the day of Shravana Nakshatra during the evening, along with a thousand kings, he took initiation. The first feast after his initiation benefited King Vrishabhasena of Rajgriha city.

Shree 1008 MuniSuvrata  Bhagwan Kevalgyana and Moksha

After spending eleven months in the state of seclusion, the Lord reached the same Neelavana forest and engaged in meditation, following the rules of Bela. On the day of the tenth day of the bright half of Vaishakha, during the evening under the Shravana Nakshatra, the Lord attained omniscience.

During the Lord’s assembly, there were eighteen Ganadharas led by Malli, thirty thousand Munirajas, fifty thousand Aryikas led by Pushpadanta, one lakh Shravakas, and three lakh Shravikas. After remaining for the rest of the month, the Lord ceased wandering and ascended to the summit of Sammed Shikhar along with a thousand munis and entered into a final meditation.

On the night of Falgun Krishna Dwadashi, in the last part of the night, the Lord attained Siddha-hood, free from the body. My salutations to Lord Munisuvrata.

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Author: Admin
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