अंगविज्जा प्रकीर्णक में केवल शारीरिक लक्षणों का उल्लेख ही नहीं है, बल्कि प्रश्न-विधि और परीक्षण की भी स्पष्ट व्यवस्था दी गई है। ग्रंथ यह मानता है कि किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले संकेतों की जाँच, परिस्थितियों का अवलोकन और व्यक्ति के आचरण का मूल्यांकन आवश्यक है।
ग्रंथकार बताते हैं कि अंगविज्जा का उपयोग करते समय प्रश्न पूछने की विधि अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रश्न स्पष्ट, उद्देश्यपूर्ण और संदर्भयुक्त होने चाहिए। अस्पष्ट या भ्रमित प्रश्नों से प्राप्त संकेत भी भ्रम उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए प्रश्नकर्ता और परीक्षक—दोनों से विवेक और संयम की अपेक्षा की गई है।
परीक्षण के संदर्भ में यह निर्देश दिया गया है कि किसी एक लक्षण या उत्तर के आधार पर निर्णय न लिया जाए। अनेक संकेतों का परस्पर मिलान, समय-परिस्थिति का विचार और व्यक्ति के व्यवहार का अवलोकन—इन सभी के बाद ही निष्कर्ष निकालना उचित माना गया है। यह पद्धति अंगविज्जा को अंधविश्वास से अलग करती है।
विवेक की भूमिका को यहाँ सर्वोपरि रखा गया है। ग्रंथ यह स्पष्ट करता है कि यदि विवेक का अभाव हो, तो कोई भी विद्या हानिकारक बन सकती है। इसलिए अंगविज्जा को प्रयोग में लाने वाला व्यक्ति नैतिकता, करुणा और उत्तरदायित्व से युक्त होना चाहिए।
इस प्रकार अंगविज्जा प्रकीर्णक यह सिखाता है कि संकेतों का ज्ञान तभी उपयोगी है, जब उसे विवेकपूर्ण परीक्षण और नैतिक दृष्टि के साथ अपनाया जाए।
विवेक के बिना ज्ञान दिशाहीन होता है; सही प्रश्न और सही परीक्षण ही सत्य तक पहुँचाते हैं।
अंगविज्जा जैसे ग्रंथ Jain philosophy की उस व्यावहारिक सोच को दर्शाते हैं, जहाँ आत्मज्ञान और विवेक को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यदि आप जैन दर्शन और आगमिक परंपरा पर आधारित ऐसी ही विचारपूर्ण कथाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी Jain philosophy: और Jain Stories: श्रेणियाँ अवश्य देखें, जहाँ जैन ग्रंथों से प्रेरित अनेक प्रामाणिक और शिक्षाप्रद कथाएँ एकत्रित रूप में उपलब्ध हैं।
