अंगविज्जा प्रकीर्णक के समग्र अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यह ग्रंथ जैन आगमिक परंपरा में एक सहायक और विवेकप्रधान विद्या के रूप में स्थान रखता है। इसका उद्देश्य मनुष्य को किसी निश्चित भाग्य-रेखा में बाँधना नहीं, बल्कि उसे स्वयं के स्वभाव, प्रवृत्तियों और आचरण को समझने का अवसर देना है।
ग्रंथ में शारीरिक लक्षणों, संकेतों, प्रश्न-विधि और परीक्षण की जो चर्चा की गई है, वह सभी आत्मनिरीक्षण और आत्म-सुधार की दिशा में मार्गदर्शन करती है। अंगविज्जा बार-बार यह स्पष्ट करती है कि संकेत तभी सार्थक हैं, जब उन्हें विवेक, नैतिकता और करुणा के साथ समझा जाए।
जैन दर्शन के मूल सिद्धांत—कर्म, पुरुषार्थ, अनेकांत और आत्म-उत्तरदायित्व—अंगविज्जा के प्रत्येक पक्ष में अंतर्निहित दिखाई देते हैं। यह ग्रंथ यह स्वीकार करता है कि कर्मों का प्रभाव अवश्य है, परंतु मनुष्य अपने पुरुषार्थ और आचार द्वारा अपने जीवन की दिशा बदल सकता है।
इस दृष्टि से अंगविज्जा को जैन दर्शन का कोई स्वतंत्र या विरोधी सिद्धांत नहीं माना गया है, बल्कि उसे दर्शन के मूल तत्त्वों के अनुरूप एक व्यावहारिक सहायक ग्रंथ के रूप में देखा गया है। यह ग्रंथ जैन परंपरा की उस संतुलित सोच को दर्शाता है, जहाँ ज्ञान, विवेक और नैतिकता एक साथ चलते हैं।
अतः अंगविज्जा प्रकीर्णक का अंतिम संदेश यही है कि स्वयं को पहचानना, स्वयं को सुधारना और विवेकपूर्वक जीवन जीना ही सच्चा कल्याण मार्ग है।
ज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य आत्मबोध और आत्म-सुधार है, न कि भविष्य का बंधन।
अंगविज्जा जैसे ग्रंथ Jain philosophy की उस व्यावहारिक सोच को दर्शाते हैं, जहाँ आत्मज्ञान और विवेक को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यदि आप जैन दर्शन और आगमिक परंपरा पर आधारित ऐसी ही विचारपूर्ण कथाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी Jain philosophy: और Jain Stories: श्रेणियाँ अवश्य देखें, जहाँ जैन ग्रंथों से प्रेरित अनेक प्रामाणिक और शिक्षाप्रद कथाएँ एकत्रित रूप में उपलब्ध हैं।
