जैन आगम साहित्य में अंग आगमों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ये आगम जैन धर्म के सिद्धांत, आचार, व्यवहार और दर्शन की मूल आधारशिला माने जाते हैं। समय के साथ विद्वानों ने यह अनुभव किया कि विभिन्न अंग आगमों में विषयवस्तु के उल्लेख अलग-अलग रूपों में प्राप्त होते हैं। कहीं विषय संक्षेप में है, कहीं विस्तार से; कहीं सूत्रात्मक शैली है, तो कहीं व्याख्यात्मक।
इसी कारण यह आवश्यक हुआ कि अंग आगमों में वर्णित विषयों का तुलनात्मक विवेचन किया जाए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि इन ग्रंथों में दिखाई देने वाला भेद वास्तव में मतभेद नहीं, बल्कि प्रस्तुति का अंतर है।
इस ग्रंथ का उद्देश्य यह दिखाना है कि आचारांग, सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग और भगवतीसूत्र जैसे अंग आगमों में जिन विषयों का उल्लेख किया गया है, वे मूल रूप से एक ही सिद्धांत पर आधारित हैं। जीव-अजीव, आचार-संयम, तप, कर्म, मोक्ष और लोक-स्वरूप जैसे विषय अलग-अलग संदर्भों में आते हैं, किंतु उनका तात्त्विक आधार समान रहता है।
लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि आगमिक विषयवस्तु को समझते समय काल, देश और श्रोता का ध्यान रखना आवश्यक है। किसी विशेष युग में किसी विशेष समुदाय को ध्यान में रखकर जिस प्रकार से विषय प्रस्तुत किया गया, वही उसकी भिन्नता का कारण बना। इसे विरोध या असंगति मानना आगमों की गहराई को न समझ पाने का परिणाम है।
तुलनात्मक अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि कोई भी अंग आगम अकेले संपूर्ण दर्शन को नहीं दर्शाता, बल्कि सभी अंग आगम मिलकर जैन दर्शन की पूर्ण और संतुलित तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार यह विवेचन आगमों की एकरूपता, वैज्ञानिकता और व्यवस्थित परंपरा को समझने का माध्यम बनता है।
सत्य एक होता है, पर उसे समझाने की शैली समय, संदर्भ और पात्र के अनुसार बदल सकती है; भिन्नता का अर्थ विरोध नहीं होता।
जैन आगमों और दर्शन को सही दृष्टि से समझने के लिए ऐसी विचारप्रधान कथाएँ अत्यंत आवश्यक हैं। यदि आप इसी प्रकार की और गूढ़ एवं प्रामाणिक कथाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी Jain Stories श्रेणी अवश्य देखें, जहाँ जैन आगमों पर आधारित अनेक ज्ञानवर्धक लेख एकत्रित रूप में उपलब्ध हैं।
