अंग आगमों का अध्ययन करते समय यह स्पष्ट दिखाई देता है कि अनेक विषय अलग-अलग आगमों में भिन्न रूपों में प्रस्तुत हुए हैं। कहीं वही विषय संक्षेप में कहा गया है, तो कहीं उसका विस्तृत विवेचन मिलता है। कहीं सूत्रों के माध्यम से बात रखी गई है, तो कहीं संवाद, उदाहरण या व्याख्या के द्वारा विषय को स्पष्ट किया गया है।
इस भिन्नता का मुख्य कारण यह नहीं है कि आगमों के सिद्धांत अलग-अलग हैं, बल्कि इसका कारण प्रस्तुति का उद्देश्य और श्रोता-वर्ग है। प्रत्येक अंग आगम की रचना किसी विशेष संदर्भ और आवश्यकता को ध्यान में रखकर की गई है। जिस प्रकार एक ही सत्य को अलग-अलग लोगों को समझाने के लिए अलग भाषा और शैली अपनाई जाती है, उसी प्रकार आगमों में भी विषयवस्तु की अभिव्यक्ति में भिन्नता पाई जाती है।
कुछ अंग आगमों में आचार और संयम पर अधिक बल दिया गया है, क्योंकि वहाँ मुख्य उद्देश्य साधक को व्यवहारिक जीवन में मार्गदर्शन देना था। वहीं कुछ आगमों में तत्त्वज्ञान, कर्म-सिद्धांत और दार्शनिक विवेचन को प्रधानता दी गई है, ताकि जिज्ञासु व्यक्ति गूढ़ तत्वों को समझ सके।
इसके अतिरिक्त, काल-परिवर्तन भी विषय प्रस्तुति में भिन्नता का एक महत्वपूर्ण कारण है। समय के साथ श्रोताओं की बौद्धिक क्षमता, सामाजिक स्थिति और आध्यात्मिक आवश्यकताओं में परिवर्तन हुआ। उसी के अनुरूप आगमिक उपदेशों की शैली और विस्तार में भी अंतर आया।
लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि यदि इन भिन्नताओं को अलग-अलग देखकर निर्णय किया जाए, तो भ्रम उत्पन्न हो सकता है। परंतु जब इन सभी अंग आगमों को एक साथ, तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी ग्रंथ एक ही तात्त्विक सत्य की ओर संकेत करते हैं।
इस प्रकार अंग आगमों में विषयवस्तु की भिन्न प्रस्तुति जैन दर्शन की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी लचीलापन, व्यावहारिकता और गहन दृष्टि का प्रमाण है।
ज्ञान की सच्चाई उसकी अभिव्यक्ति की एकरूपता में नहीं, बल्कि उसके मूल तत्त्व की स्थिरता में होती है।
जैन आगमों को सही रूप में समझने के लिए उनकी प्रस्तुति के पीछे छिपे उद्देश्य को जानना आवश्यक है। यदि आप इसी प्रकार की और गहन तथा विचारशील कथाएँ पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी Jain Stories श्रेणी अवश्य देखें, जहाँ जैन दर्शन और आगमों पर आधारित अनेक प्रामाणिक लेख संग्रहित हैं।
