Introduction of Shree 1008 Neminath Bhagwan: 22th Tirthanknara of Jainism

Introduction of Shree 1008 Neminath Bhagwan: 22th Tirthanknara of Jainism

श्री नेमिनाथ भगवान का परिचय

अगले भगवानश्री पार्श्वनाथ भगवान
पिछले भगवाननमिनाथ भगवान
चिन्हशंख 
पिताराजा श्री समुद्रविजय
मातामहारानी शिवा देवी
जन्म स्थानशौरीपुर में
निर्वाण स्थानगिरनार पर्वत पर
रंगकाला वर्ण
तीसरे भव पूर्व पर्याय का नामराजा श्री चंद्र के सुप्रतिष्ठ नामक पुत्र
वंशयादव वंश में
दीक्षा पालकीदेवकुरू नाम की पालकी
अवगाहनादस धनुष
आयुएक हजार वर्ष की
दीक्षा वृक्षबांसवृक्ष के नीचे
प्रथम आहारद्वारिका पुरी में वरदत्त नाम के राजा ने दूध की खीर का आहार
क्षेत्रपालश्री कोकल जी, श्री खागनाम जी, श्री त्रिनेत्र जी, श्री कलिंग जी
श्री नेमिनाथ भगवान का परिचय

श्री 1008 नेमिनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

गर्भकार्तिक शुक्ल 6
जन्मश्रावण शुक्ल 6
दीक्षाश्रावण शुक्ल 6
केवलज्ञानअश्विन शुक्ल 1
मोक्षआषाढ़ शुक्ल 8
वैराग्यबंध हुए पशुओं को देखकर
श्री 1008 नेमिनाथ भगवान की पंचकल्याणक तिथियां

श्री 1008 नेमिनाथ भगवान का समवशरण

शासन यक्षसर्वाण्हदेव यक्ष
शासन देवीश्री कुष्मांडनी देवी
गणधरग्यारह गणधर
प्रमुख गणधरगणधर श्री वरदत्त जी
आर्यिकायेंचालीस हजार आर्यिकायें
श्रावकएक लाख श्रावक
श्राविकायेंतीन लाख श्राविकायें
प्रमुख आर्यिका गणिनी आर्यिका प्रमुख राजुलमती जी
कौन से कूट से मोक्षउर्जयंत टौंक से
श्री 1008 नेमिनाथ भगवान का समवशरण

नेमिनाथ भगवान का परिचय

ष्करार्ध द्वीप के पश्चिम सुमेरू की पश्चिम दिशा में जो महानदी (सीतोदा नदी) है उसके उत्तर तट पर एक गंधिल नाम का महादेश है। उसके विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी में सूर्यनगर का स्वामी सूर्यप्रभ राज्य करता था। उसकी स्त्री का नाम धारिणी था। दोनों के चिन्तागति, मनोगति और चपलगति नाम के तीनपुत्र हुए। उसी विजयार्ध की उत्तर श्रेणी के अरिन्दमन नगर में राजा अरिंजय की अजितसेना रानी से प्रीतिमती नाम की पुत्री हुई। उसने यह प्रतिज्ञा की थी कि जो विद्या से मेरू की प्रदक्षिणा में मुझे जीत लेगा, मैं उसी से विवाह करूँगी। उसने अपनी विद्या से चिन्तागति को छोड़कर समस्त विद्याधर कुमारों को मेरूपर्वत की तीन प्रदक्षिणा में जीत लिया। तब चिन्तागति उसे अपने वेग से जीतकर कहने लगा कि तू रत्नों की माला से मेरे छोटे भाई को स्वीकार कर। प्रीतिमती बोली, जिसने मुझे जीता है उसके सिवाय मैं दूसरे का वरण नहीं करूँगी। चिन्तागति ने कहा, चूँकि तूने पहले उन्हें प्राप्त करने की इच्छा से ही मेरे छोटे भाई के साथ गति युद्ध किया था अत: तू मेरे लिये त्याज्य है। चिन्तागति के यह वचन सुनते ही वह विरक्त हो गई और विवृत्ता नाम की आर्यिका के पास जाकर दीक्षित हो गई। यह देख वहाँ बहुत से लोगों ने दीक्षा धारण कर ली। कन्या का यह साहस देखकर चिन्तागति ने भी अपने दोनों भाइयों के साथ दमवर नामक गुरू के पास दीक्षा ले ली। बहुत काल तक तपश्चरण करते हुये वे तीनों समाधिपूर्वक मरकर चौथे स्वर्ग में देव हो गये। मनोगति और चपलगति नाम के दोनों छोटे भाई के जीव स्वर्ग से च्युत हुए। जम्बूद्वीपसम्बन्धी पूर्व विदेहक्षेत्र के पुष्कला देश में जो विजयार्ध पर्वत है, उसकी उत्तरश्रेणी में गगनवल्लभ नगर के राजा गगनचन्द की गगनसुंदरी रानी से दोनों देव के जीव अमितगति और अमिततेज नाम के पुत्र उत्पन्न हो गये। इसी जम्बूद्वीप के पश्चिम विदेह में सीतोदा के उत्तर तट पर सुगंधिलादेश में एक सिंहपुर नाम का नगर है। उसके अर्हदास राजा की जिनदत्ता रानी से चिंतागति देव का जीव च्युत होकर पुत्र हो गया। माता-पिता ने उसका नाम अपराजित रखा था। किसी दिन राजा अर्हदास ने मनोहर नामक उद्यान में पधारे हुए विमलवाहन तीर्थंकर की वंदना करके धर्मरूपी अमृत का पान किया। अनन्तर अपराजित पुत्र को राज्य देकर पाँच सौ राजाओं के साथ मुनि हो गये। कुमार अपराजित पिता के दिये हुए राज्य का संचालन करने लगे और सम्यग्दर्शन तथा अणुव्रत से विभूषित होकर धर्म का पालन करने लगे। किसी दिन उन्होंने सुना कि ‘हमारे पिता के साथ श्री विमलवाहन भगवान गंधमादन पर्वत से मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं।’ यह सुनते ही उन्होंने प्रतिज्ञा की कि ‘ मैं विमलवाहन भगवान के दर्शन किये बिना भोजन नहीं करूँगा।’ इस प्रतिज्ञा से उसे आठ दिन का उपवास हो गया। तदनंतर इन्द्र की आज्ञा से यक्षपति ने उस राजा को भगवान विमलवाहन का साक्षात्कार कराकर दर्शन कराया अर्थात् समवसरण बनाकर विमलवाहन का दर्शन कराया। किसी एक दिन बसंत ऋतु में अष्टान्हिका के समय बुद्धिमान राजा अपराजित जिन प्रतिमाओं की पूजा- स्तुति करके वहीं पर बैठे हुए धर्मोपदेश कर रहे थे कि उसी समय आकाश से दो चारणऋद्धिधारी मुनिराज आकर वहीं पर विराजमान हो गये। राजा ने उनके सम्मुख जाकर बड़ी विनय से उनके चरणों में नमस्कार किया, धर्मोपदेश सुना, अनन्तर कहा कि हे पूज्य! मैं पहले कभी आपको देखा है। उनमें से ज्येष्ठ मुनि बोले-हाँ राजन्! ठीक कहते हो, आपने हम दोनों को देखा है परंतु कहाँ देखा है ? वह स्थान मैं कहता हूँ सो सुनो- पुष्करार्धद्वीप के पश्चिममेरूसंबंधी पश्चिम विदेह में गंधिल नाम का महादेश है। उसके विजयार्ध की उत्तरश्रेणी में सूर्यप्रभ नगर के राजा सूर्यप्रभ के चिंतागति, मनोगति और चपलगति नाम के तीन पुत्र थे। प्रीतिमती नाम की विद्याधर कन्या के गतियुद्ध के प्रसंग में हम तीनों ने दीक्षित होकर तपश्चरण करके चतुर्थ स्वर्ग को प्राप्त किया था। वहाँ से च्युत होकर हम दोनों छोटे भाई पूर्व विदेह में अमितगति और अमिततेज नाम के विद्याधर हुए हैं। किसी एक दिन हम दोनों पुण्डरीकिणी नगरी गये। वहाँ श्री स्वयंप्रभ तीर्थंकर से हम दोनों ने अपने पिछले तीन जन्मों का वृत्तांत पूछा। तब भगवान ने सब भवावली बतलाई। अनन्तर हमने पूछा कि हमारा बड़ा भाई इस समय कहाँ है? इसके उत्तर में भगवान ने कहा कि वह सिंहपुर का अपराजित नाम का राजा है। यह सुनकर हम दोनों ने उन्हीं के पास जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली और तुम्हें देखने के लिए जन्मान्तर के स्नेहवश यहाँ आये हैं। अब तुम्हारी आयु केवल एक माह की शेष रह गई है, शीघ्र ही आत्म कल्याण करो। हे अपराजित! तुम इससे पाँचवें भव में भरतक्षेत्र के हरिवंश नामक महावंश में ‘अरिष्टनेमि’ नाम के तीर्थंकर होवोगे।’ यह सुनकर राजा ने बार-बार उन मुनियों की वंदना की और कहा कि आप यद्यपि निगं्र्रथ अवस्था को प्राप्त हुए हैं तो भी जन्मांतर के स्नेह से आपने मेरा बड़ा ही उपकार किया है। अनंतर मुनिराज के चले जाने के बाद राजा ने अपने पुत्र को राज्य देकर आप प्रायोपगमन संन्यास विधि से मरण करके सोलहवें स्वर्ग में अच्युतेन्द्र हो गये। वह पुण्यात्मा वहाँ के दिव्य भोगों का अनुभव कर आयु के अंत में वहाँ से च्युत हुआ। इसी जंबूद्वीप के भरतक्षेत्रसंबंधी कुरुजांगल देश में हस्तिनापुर के राजा श्रीचन्द्र की श्रीमती रानी से सुप्रतिष्ठ नाम का यशस्वी पुत्र हुआ। कालांतर में पिता द्वारा प्रदत्त राज्य का निष्कंटक उपभोग करते हुये किसी दिन यशोधर नाम के मुनिराज को आहारदान देकर पंचाश्चर्य को प्राप्त किया। किसी दूसरे दिन वह राजा रानियों के साथ राजमहल की छत पर बैठा हुआ दिशाओं की शोभा का अवलोकन कर रहा था कि इसी बीच अकस्मात् उल्कापात को देखकर विरक्त हो गया और सुमंदर नामक जिनेन्द्र भगवान के पास जाकर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। ‘मुनिराज सुप्रतिष्ठ ने ग्यारह अंग और चौदह पूर्वों का अध्ययन किया और सर्वतोभद्र को आदि लेकर सिंहनिष्क्रीडितपर्यन्त अनेकों व्रतों का अनुष्ठान किया। हे यादव! श्रवणमात्र से ही पापों को नष्ट करने वाले उन उपवासों की महाविधि को तुम स्थिर मन कर के सुनो। ऐसा हरिवंश पुराण में बताया है। यहाँ इन व्रतों की विधि न बतलाकर केवल कुछ नाममात्र दिये जाते हैं। विशेष जिज्ञासुओं को हरिवंश पुराण में ही देखना चाहिए। ‘सर्वतोभद्र, वसंतभद्र, महासर्वतोभद्र, त्रिलोकसार, वङ्कामध्य, मृदंगमध्य, मुरजमध्य, एकावली, द्विकावली, मुक्तावली, रत्नावली, रत्नमुक्तावली, कनकावली, द्वितीय रत्नावली, सिंहनिष्क्रीडित, मध्यम सिंहनिष्क्रीडित तथा उत्तम और जघन्य सिंहनिष्क्रीडित, नंदीश्वरपंक्ति, मेरूपंक्ति, विमानपंक्ति, शातकुम्भ, चान्द्रायण, सप्तसप्तमतपोविधि, अष्टअष्टम, नवनवमादि, आचाम्लवर्धन, श्रुतविधि, दर्शनशुद्धि, तप:शुद्धि, चारित्रशुद्धि, एककल्याण, पंचकल्याण, शीलकल्याण विधि, भावनाविधि, पंचविंशति-कल्याण भावनाव्रत, दु:खहरण कर्मक्षय, जिनेंद्रगुण संपत्ति, दिव्यलक्षणपंक्ति, धर्मचक्रविधि, परस्पर कल्याण, परिनिर्वाण, प्रातिहार्य प्रसिद्धि, विमानपंक्ति आदि व्रत। ‘इस प्रकार विधिवत् इन व्रतों के कर्ता सुप्रतिष्ठ मुनिराज ने उस समय निर्मल सोलहकारण भावनाओं के द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बंध कर लिया। जब आयु का अंत आया, तब समाधि धारण कर एक महीने का संन्यास लेकर प्राणों का त्याग किया और जयंत नामक अनुत्तर विमान में अहमिंद्र पद प्राप्त कर लिया। वहाँ पर तेंतीस सागर की आयु थी और एक हाथ ऊँचा शरीर था। उनको साढ़े सोलह माह के अंत में एक बार श्वास का ग्रहण होता है। तेंतीस हजार वर्ष बीत जाने पर एक बार मानसिक आहार था। इस प्रकार सुखसागर में निमग्न उन अहमिंद्र ने वहाँ की आयु को समाप्त कर दिया।

नेमिनाथ भगवान का गर्भ और जन्म

कुशार्थ देश के शौरीपुर नगर में हरिवंशी राजा शूरसेन रहते थे। उनके वीर नाम के पुत्र की धारिणी रानी से अंधकवृष्टि और नरवृष्टि नाम के दो पुत्र हुए। अंधकवृष्टि की रानी का नाम सुभद्रा था। इन दोनों के समुद्रविजय, स्तिमितसागर, हिमवान्, विजय, अचल, धारण, पूरण, पूरितार्थीच्छ, अभिनंदन और वासुदेव ये दस पुत्र थे तथा कुन्ती और माद्री नाम की दो पुत्रियाँ थीं। समुद्रविजय की रानी का नाम शिवादेवी था। पिता के द्वारा प्रदत्त राज्य का श्रीसमुद्रविजय महाराज धर्मनीति से संचालन करते थे। छोटे भाई वसुदेव की रोहिणी रानी से बलभद्र एवं देवकी रानी से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जब जयंत विमान के इन्द्र की आयु छह मास की शेष रह गई, तब काश्यपगोत्री, हरिवंश शिखामणि राजा समुद्रविजय की रानी शिवादेवी के आंगन में देवोें द्वारा की गई रत्नों की वर्षा होने लगी। कार्तिक शुक्ला षष्ठी के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में वह अहमिंद्र का जीव रानी के गर्भ में आ गया। अनंतर नवमास के बाद श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन चित्रा नक्षत्र में ब्रह्मयोग के समय तीन ज्ञान के धारक भगवान का जन्म हुआ। इंद्रादि देवोें ने जन्मोत्सव मनाकर तीर्थंकर शिशु का ‘नेमिनाथ‘ नामकरण किया। भगवान नमिनाथ के बाद पाँच लाख वर्ष बीत जाने पर नेमिजिनेन्द्र उत्पन्न हुये हैं। उनकी आयु एक हजार वर्ष की थी, शरीर दश धनुष ऊँचा था। प्रभु के शरीर का वर्ण नील कमल के सदृश होते हुये भी इतना सुन्दर था कि इंद्र ने एक हजार नेत्र बना लिये, फिर भी रूप को देखते हुये तृप्त नहीं हुआ था। हरिवंशपुराण में नेमिनाथ तीर्थंकर का जन्म सौर्यपुर में ही माना है। पश्चात् देवों द्वारा रची गई द्वारावती नगरी में श्रीकृष्ण आदि के जाने की बात कही है। कारणवश श्रीकृष्ण तथा होनहार श्री नेमिनाथ तीर्थंकर के पुण्य प्रभाव से इन्द्र की आज्ञा पाकर कुबेर ने एक सुन्दर ‘द्वारावती’ नामक नगरी की रचना की। भगवान देवों द्वारा आनीत दिव्य भोगसामग्री का अनुभव करते हुये चिरकाल तक द्वारावती में रहे। किसी एक दिन मगध देश के कुछ व्यापारी उस नगरी में आ गये और वहाँ से श्रेष्ठरत्न खरीद कर अपने देश में ले गये तथा अर्धचक्री (प्रतिनारायण) राजा जरासंध को रत्न भेंट किये। राजा ने उन रत्नों को देखकर महान आश्चर्यचकित होकर उनसे पूछा कि आप ये रत्न कहाँ से लाये हो ? उत्तर में उन लोगों ने श्रीकृष्ण और भगवान नेमिनाथ के वैभव का वर्णन कर दिया। यह सुनते ही जरासंध कुपित होकर युद्ध करने को तैयार हो गया। ‘शत्रु चढ़कर आ गया है’ यह समाचार सुनकर श्रीकृष्ण को जरा भी चिंता नहीं हुई। वे भगवान नेमिनाथ के पास गये और बोले कि आप इस नगर की रक्षा कीजिये। सुना है कि राजा जरासंध हम लोगों को जीतना चाहता है सो मैं उसे आपके प्रभाव से घुने हुये जीर्णवृक्ष के समान शीघ्र ही नष्ट किये देता हूँ। श्रीकृष्ण के वचन सुनकर प्रभु ने अपने आप अवधिज्ञान से विजय को निश्चित जानकर मुस्कुराते हुये ‘ओम्’ शब्द कह दिया अर्थात् अपनी स्वीकृति दे दी। श्रीकृष्ण भी प्रभु की मुस्कान से अपनी विजय को निश्चित समझकर समस्त यादव और पांडव आदिकों के साथ कुरुक्षेत्र में आ गये। इस भयंकर युद्ध में राजा जरासंध ने कुपित होकर चक्र श्रीकृष्ण पर चला दिया। वह चक्ररत्न भी श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा देकर उनकी दाहिनी भुजा पर ठहर गया। बस क्या था, श्रीकृष्ण ने उसी चक्र से जरासंध का काम समाप्त कर दिया और तत्क्षण ही देवों द्वारा पूजा को प्राप्त हुए और अर्धचक्री (नारायण) हो गये। अनंतर बड़े हर्ष से इन लोगों ने द्वारावती में प्रवेश किया और वहाँ पर राज्याभिषेक को प्राप्त हुए। ‘किसी एक दिन कुबेर द्वारा भेजे हुए वस्त्राभरणों से अलंकृत युवा श्री नेमिकुमार, बलदेव तथा नारायण आदि कोटि-कोटि यादवों से भरी हुई कुसुमचित्रा नाम की सभा में गये। राजाओं ने अपने-अपने आसन छोड़ प्रभु के सन्मुख आकर उन्हें नमस्कार किया। श्रीकृष्ण ने भी आकर उनकी अगवानी की। तदनंतर श्रीकृष्ण के साथ वे उनके आसन को अलंकृत करने लगे। वहाँ वार्तालाप के प्रसंग में बलवानों की गणना छिड़ने पर किसी ने अर्जुन को, किसी ने युधिष्ठिर को इत्यादि रूप से किसी ने श्रीकृष्ण को अत्यधिक बलशाली कहा। तरह-तरह की वाणी सुनकर बलदेव ने लीलापूर्ण दृष्टि से भगवान की ओर देखकर कहा कि तीनों जगत में इनके समान दूसरा बलवान् नहीं है, ये गिरिराज को अनायास ही वंâपायमान कर सकते हैं, यथार्थ में ये जिनेंद्र हैं इनसे उत्कृष्ट दूसरा कौन हो सकता है ? इस प्रकार वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने भगवान से कहा-भगवन्! यदि आपके शरीर का ऐसा उत्कृष्ट बल है तो बाहुयुद्ध में उसकी परीक्षा क्यों न ली जाये ? भगवान ने कहा-हे अग्रज! यदि आपको मेरी भुजाओं का बल जानना ही है तो मल्लयुद्ध की क्या आवश्यकता है ? सहसा इस आसन से मेरे इस पैर को ही विचलित कर दीजिये। श्रीकृष्ण उसी समय कमर कसकर जिनेंद्र भगवान को जीतने की इच्छा से उठ खड़े हुए, परन्तु पैर का चलाना तो दूर ही रहा, वे एक अंगुली को भी नहीं हिला सके। उसी समय इन्द्र का आसन वंâपित होने से देवों सहित इन्द्र ने आकर भगवान की अनेकों स्तुतियों से स्तुति और पूजा की। तदनंतर सब अपने-अपने महलों में चले गये। नेमिनाथ का वैराग्य-किसी समय मनोहर नामक उद्यान में भगवान नेमिनाथ तथा सत्यभामा आदि जलकेलि कर रहे थे। स्नान के अनंतर श्री नेमिनाथ ने सत्यभामा से कहा-हे नीलकमल के समान नेत्रों वाली! तू मेरा यह स्नान का वस्त्र ले। सत्यभामा ने कहा, मैं इसका क्या करूँ ? नेमिनाथ ने कहा कि तू इसे धो डाल। तब सत्यभामा कहने लगी कि क्या आप श्रीकृष्ण हैं ? वह श्रीकृष्ण, जिन्होंने कि नागशय्या पर चढ़कर शाङ्र्ग नाम का धनुष अनायास ही चढ़ा दिया था और दिग्दिगंत को व्याप्त करने वाला शंख पूरा था? क्या आपमें यह साहस है? यदि नहीं है तो आप मुझसे वस्त्र धोने की बात क्यों करते हैं ? नेमिनाथ ने कहा कि ‘मंै यह कार्य अच्छी तरह कर दूँगा’ इतना कहकर वे आयुधशाला में पहुँच गये। वहाँ नागराज के महामणियों से सुशोभित नागशय्या पर अपनी ही शय्या के समान चढ़ गये और शाङ्र्ग धनुष चढ़ाकर समस्त दिशाओं के अंतराल को रोकने वाला शंख पूंâक दिया। उस समय श्रीकृष्ण अपनी कुसुमचित्रा सभा मेें विराजमान थे। वे सहसा ही यह आश्चर्यपूर्ण काम सुनकर व्यग्र हो उठे। बड़े आश्चर्य से विंâकरों से पूछा कि यह क्या है ? विंâकरों ने भी पता लगाकर सारी बात बता दी। उस समय अर्धचक्री श्रीकृष्ण ने विचार करते हुये कहा कि आश्चर्य है, बहुत समय बाद कुमार नेमिनाथ का चित्त राग से युक्त हुआ है। अब इनका विवाह करना चाहिए। वे शीघ्र ही राजा उग्रसेन के घर स्वयं पहुँच गये और रानी जयावती से उत्पन्न राजीमति कन्या की श्रीनेमिनाथ के लिए याचना की। राजा उग्रसेन ने कहा-हे देव! आप तीन खण्ड के स्वामी हंै अत: आपके सामने हम लोग कौन होते हैं ? शुभ मुहूर्त में विवाह निश्चित हो गया।

नेमिनाथ भगवान का तप

तदनंतर देवोें द्वारा आनीत नाना प्रकार के वस्त्राभूषणों से सुसज्जित भगवान नेमिनाथ, समान वयवाले अनेक मंडलेश्वर राजपुत्रों से घिरे हुये चित्रा नाम की पालकी पर आरूढ़ होकर दिशाओं का अवलोकन करने के लिए निकले। वहाँ उन्होंने करुणस्वर से चिल्लाते हुये और इधर-उधर दौड़ते हुए, भूख-प्यास से व्याकुल हुए तथा अत्यंत भयभीत हुए, दानदृष्टि से युक्त मृगों को देख दयावश वहाँ के रक्षकों से पूछा कि यह पशुसमूह क्यों इकट्ठा किया गया है ? नौकरों ने कह दिया कि आपके विवाह में ये मारे जायेंगे। उसी समय श्री नेमिकुमार को पशुओं के अत्याचार के प्रति करुणा जाग्रत हो गई और शीघ्र ही भोगों से वैराग्य उत्पन्न हो गया और विरक्तचित्त हुए लौटकर अपने घर वापस आ गये। अपने अनेक पूर्वभवों का स्मरण कर भयभीत हो गये। अब तक प्रभु के कुमार काल के तीन सौ वर्ष व्यतीत हो चुके थे। तत्क्षण ही लौकांतिक देवों से पूजा को प्राप्त हुए प्रभु को देवों ने देवकुरू नाम की पालकी पर बिठाया और सहस्राम्र वन में ले गये। श्रावण कृष्ण षष्ठी के दिन सायंकाल के समय तेला का नियम लेकर एक हजार राजाओं के साथ जैनेश्वरी दीक्षा से विभूषित हो गये। उसी समय उन्हें चौथा मन:पर्यय ज्ञान प्रगट हो गया। राजीमती ने भी प्रभु के पीछे तपश्चरण करने का निश्चय कर लिया, सो ठीक ही है क्योंकि शरीर की बात तो दूर ही रही, वचनमात्र से भी दी हुई कुलस्त्रियों का यही न्याय है। पारणा के दिन द्वारावती नगरी में राजा वरदत्त ने पड़गाहन करके प्रभु को आहार दिया जिसके फलस्वरूप पंचाश्चर्य को प्राप्त हो गये अर्थात् देवों ने साढ़े बारह करोड़ रत्न वर्षाएँ। पुष्पवृष्टि, रत्नवृष्टि, मन्द सुगन्ध वायु, दुन्दुभी बाजे और अहोदानं आदि प्रशंसा वाक्य होने लगे।

नेमिनाथ भगवान का केवलज्ञान और मोक्ष

इस प्रकार तपश्चर्या करते हुये प्रभु के छद्मस्थ अवस्था के छप्पन दिन व्यतीत हो गये, तब वे रैवतक पर्वत पर पहुँचे। तेला का नियम लेकर किसी बड़े भारी बाँस वृक्ष के नीचे विराजमान हो गये। आश्विन कृष्ण प्रतिपदा के दिन चित्रा नक्षत्र में प्रात:काल के समय प्रभु को लोकालोकप्रकाशी केवलज्ञान प्रकट हो गया। उनके समवसरण में वरदत्त को आदि लेकर ग्यारह गणधर थे, अठारह हजार मुनि, राजीमती आदि चालीस हजार आर्यिकाएँ, एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ थीं। भगवान की सभा में बलभद्र और श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष आये, धर्म का स्वरूप सुना और अपने सभी भव-भवांतर पूछे। किसी समय भगवान की दिव्यध्वनि से यह बात मालूम हुई कि ‘द्वीपायन मुनि के क्रोध के निमित्त से इस द्वारावती नगरी का विनाश होगा’ इस भावी दुर्घटना को सुनकर कितने ही महापुरुषों ने जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली थी। इस प्रकार प्रभु नेमिनाथ ने छह सौ निन्यानवे वर्ष, नौ महीना और चार दिन तक विहार किया था।

अनन्तर गिरनार पर्वत पर आकर विहार छोड़कर पाँच सौ तेतीस मुनियों के साथ एक महीने का योग निरोध करके आषाढ़ शुक्ला सप्तमी के दिन चित्रा नक्षत्र में रात्रि के प्रारम्भ में ही प्रभु ने अघातिया कर्मों का नाशकर मोक्षपद प्राप्त कर लिया। उसी समय इंद्रादि देवों ने आकर बड़ी भक्ति से प्रभु का परिनिर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया। वे श्री नेमिनाथ भगवान हमारे अंत:करण को पूर्णशांति प्रदान करें।

Shree 1008 Neminath Bhagwan‘s Introduction

Next LordShri Parshvanath Bhagwan
Previous LordNaminath Bhagwan
Signshell/Conch
FatherRaja Sri Samudra Vijay
MotherMaharani Shiva Devi
Birth placein Shauripur
Nirvana placeon Mount Girnar
Colorblack
name of third bhava purva synonymKing Shri Chandra’s son named Supratistha
Lineagein Yadav dynasty
initiation palanquinPalki named Devkuru
Heightten bows
Agea thousand years old
initiation treeunder the bamboo tree
First DietIn Dwarka Puri, a king named Varadatta had a diet of milk pudding.
kshetrapalaShri Kokal ji, Shri Khagnam ji, Shri Trinetra ji, Shri Kalinga ji
Shree 1008 Neminath Bhagwan‘s Introduction

Panchkalyanak dates of Shree 1008 Neminath Bhagwan

ConceptionKarthik Shukla 6
BirthShravan Shukla 6
Initiation (Diksha)Shravan Shukla 6
Attainment of Pure Knowledge (Kevalgyan)Ashwin Shukla 1
Liberation (Moksha)Ashadh Shukla 8
Renunciation (Vairagya)looking at tied animals
Panchkalyanak dates of Shri 1008 Neminath Bhagwan

Assimilation/Samavsharan of Shree 1008 of Lord Neminath

YakshaSarvaanhadev Yaksha
YakshiniSri Kushmandani Devi
Ganadhareleven gandharas
Chief GanadharGanadhar Shri Varadat ji
Aryikasforty thousand aryikas
Shravaksone lakh listeners
Shravikasthree lakh listeners
Chief AryankaGanini Aryika chief Rajulmati ji
Which Koot gives salvationfrom Urjayant Tonk
Assimilation/Samavsharan of Shri 1008 of Lord Neminath

Introduction of Lord Neminath

There is a continent named Gandhil on the north bank of Mahanadi (Sitoda River) in the western direction of Sumeru, west of Karardha Island. Suryaprabha, the lord of Suryanagar, ruled in the northern range of his Vijayardha mountain. His wife’s name was Dharini. Both of them had three sons named Chintagati, Manogati and Chapalgati.King Arinjay had a daughter named Pritimati from Queen Ajitasena in Arindaman city of the northern range of the same Vijayardha. She had vowed that I would marry the one who would win me over in the circumambulation of Meru through knowledge. With his knowledge, he conquered all the Vidyadhar Kumars except Chintagati in three circumambulation of Mount Meru.

Then Chintagati overpowered him with his speed and said, “Please accept my younger brother with the garland of gems.” Pritimati said, I will not choose anyone else except the one who has won me. Chintagati said, since you had earlier fought with my younger brother with the desire to get him, hence you are worth sacrificing for me. As soon as Chintagati heard these words, she became disinterested and went to an Aryika named Vivarta and got initiated.Seeing this, many people took initiation there. Seeing this courage of the girl, Chintagati along with his two brothers took initiation from a guru named Damwar. After performing penance for a long time, all three of them died in Samadhi and became gods in the fourth heaven. The souls of two younger brothers named Manogati and Chapalgati fell from heaven.In the north range of Vijayardha mountain in the Pushkala country of East Videha area related to Jambudweep, the sons of both the gods named Amitgati and Amitatej were born from the Gagansundari queen of King Gaganchand of Gaganvallabh city.There is a town named Singhpur in Sugandhiladesh, on the north bank of Sitoda in West Videha of Jambudweep. Chintagati Dev lost his life and gave birth to a son from his servant Raja’s Jinadatta queen. Parents had named him Aparajit. One day, King Arhadas worshiped Vimalvahana Tirthankar who had come to a garden named Manohar and drank the nectar of religion. After giving the kingdom to the undefeated son, he became a sage along with five hundred kings.Kumar Aparajit started governing the kingdom given by his father and after being adorned with Samyagdarshan and Anuvrata, he started following the religion. One day he heard that ‘Lord Vimalvahan has attained salvation from Gandhamadan mountain.’ On hearing this, he took a vow that ‘I will not eat food without seeing Lord Vimalvahan’ for eight days. The fast is over.Thereafter, with the permission of Indra, Yakshapati made that king see Lord Vimalvahana, that is, he made him see Vimalvahana by making Samavasarana. One day in the spring season, at the time of Ashtanhika, the wise king Aparajit was sitting there worshiping and giving sermons to the idols, when at the same time two Charanariddhidhari sages came from the sky and sat there.The king went in front of him and humbly bowed at his feet, listened to the sermon, and then said, O respected one! I have never seen you before. The eldest sage among them said – Yes king! You are right, you have seen both of us but where? I tell you that place, so listen – there is a continent named Gandhil in the western Videha, related to West Meru of Pushkarardhdweep.

In the latter part of his Vijayardha, King Suryaprabha of Suryaprabha city had three sons named Chintagati, Manogati and Chapalgati. In the context of the Gatiyudha of a learned girl named Pritimati, all three of us had attained the fourth heaven after being initiated and doing penance. After leaving there, both our younger brothers became scholars named Amitgati and Amittej in Purva Videha.One day both of us went to Pundarikini city. There we both asked Shri Swayamprabh Tirthankar about the details of our last three births. Then God told everything. Later we asked where is our elder brother at this time? In response, God said that he was the king of Singhpur named Aparajit.

Hearing this, both of us took Jaineshwari initiation from him and have come here out of love for many births to see you. Now only one month is left for you to live, do good to yourself soon. O undefeated! In the fifth life, you will be a Tirthankar named ‘Arishtanemi’ in the great dynasty of Bharatkshetra.’ Hearing this, the king worshiped those sages again and again and said that even though you have attained the state of Nigratha, you have attained the highest level of love in every birth. He has done me a great favor.

Later, after the departure of Muniraj, the king gave the kingdom to his son and after dying through the method of Prayopagamana Sannyasa, he became Achyutendra in the sixteenth heaven. That virtuous soul, after experiencing the divine pleasures there, passed away at the end of his life. King Srichandra of Hastinapur in the Kurujangal country of Bharat region of Jambudweep had a famous son named Supratistha from his wife Queen.

Later on, while enjoying the kingdom given by his father, one day he attained Panchacharya by donating food to a monk named Yashodhar. Another day, he was sitting on the roof of the palace with the king and queens, observing the splendor of the directions, when suddenly seeing the meteorite, he became disillusioned and went to Lord Jinendra named Sumandar and took initiation from Jaineshwari.

Muniraj Supratistha studied the eleven Angas and fourteen Purvas and performed many fasts, taking Sarvatobhadra as the beginning, till Simhanishkridit. Hey Yadav! Listen with a steady mind to the great method of fasting which destroys sins just by hearing it. This is mentioned in Harivansh Purana.

Here, instead of explaining the method of these fasts, only some nominal ones are given.Particularly curious people should look into Harivansh Purana only. ‘Sarvatobhadra, Vasantbhadra, Mahasarvatobhadra, Triloksara, Vankamadhya, Mridangamadhya, Murajamadhya, Ekavali, Dvikavali, Muktavali, Ratnavali, Ratnamuktavali, Kanakavali, Second Ratnavali, Simhanishkridit, Madhyam Simhanishkridit and Uttam and Jaganya Simhinishkridit,Nandishwarpaksha, Maraupankti, Vimanati, Shatakumbha, Chandrayana, Saptasamatvidhi, Ashtam, Navnavamadi, Achamlavardhana, Shrutavidhi, Darshan Shuddhi, Tapa: Shraddhi, Charitrashudhi, Ekkalyan, Panchakalyan, Shikala welfare, modesty method, Bhavnakshi-Vidhiya Bhavana Bhavnavit, Varna Karmavidhi Bhavana, Dharna Karmavidhi Property, Doodle Fasts like Divya Lakshana Pankti, Dharmachakra Vidhi, mutual welfare, Parinirvana, Pratiharya fame, Vimana Pankti etc.

In this way, the well-known Muniraj, who duly performed these vows, at that time took the vow of Tirthankar Naamkarma through pure sixteen-fold feelings. When his age came to an end, he attained Samadhi, took a month’s sannyasa, sacrificed his life and attained the status of Ahmindra in the Anuttar Vimana named Jayant. There Sagar was thirty-three years old and had a body that was one hand high. They have an eclipse of breath once at the end of sixteen and a half months. After thirty-three thousand years had passed, there was once a mental diet.In this way, Ahmindra, immersed in the ocean of happiness, ended his life there.

Pregnancy and birth of Lord Neminath

Harivanshi king Shursen lived in Shauripur city of Kushartha country. His son named Veer had two sons named Andhakavrishti and Naravrishti from his wife Rani. The name of the queen of dark rain was Subhadra. Both of them had ten sons named Samudravijay, Stimitsagar, Himavan, Vijay, Achal, Dharan, Puran, Puritarthicha, Abhinandan and Vasudev and two daughters named Kunti and Madri. The name of the queen of Samudra Vijay was Shivadevi. Shri Samudra Vijay Maharaj ruled the kingdom given by his father with religious principles.Balbhadra was born from Rohini queen of younger brother Vasudev and Shri Krishna was born from Devaki queen. When Indra of Jayant Viman had six months left in his life, then it started raining gems given by the gods in the courtyard of Shivadevi, the queen of Kashyapagotri, Harivansh Shikhamani king Samudravijaya. On the day of Kartik Shukla Shashthi, in Uttarashadha Nakshatra, that creature of Ahmindra came into the queen’s womb.After Anantar Navamas, on the day of Shravan Shukla Shashthi, at the time of Brahmayoga, God, the holder of three knowledge, was born in Chitra Nakshatra. Indradi gods celebrated the birth anniversary and named the Tirthankar child ‘Neminath’. Nemijinendra was born after five lakh years of Lord Naminath. His age was one thousand years, his body was ten bows high.Despite the complexion of the Lord’s body resembling a blue lotus, it was so beautiful that Indra created a thousand eyes, yet he was not satisfied looking at the form. In Harivanshpuran, Neminath Tirthankar is considered to have been born in Sauryapur. Later, it is said that Shri Krishna etc. went to the city of Dwaravati created by the Gods. Due to the virtuous influence of Shri Krishna and the promising Shri Neminath Tirthankar, after receiving the permission of Indra, Kuber created a beautiful city named ‘Dwaravati’.

The Lord remained in Dwaravati for a long time, experiencing the divine pleasures bestowed by the Gods. One day, some traders from the country Magadha came to that city and bought precious gems from there and took them to their country and presented the gems to King Jarasandha of Ardhachakri (Pratinarayan). The king was very surprised to see those gems and asked him, where did you bring these gems from?In reply they described the glory of Shri Krishna and Lord Neminath. On hearing this, Jarasandha got angry and got ready to fight. Hearing the news that ‘the enemy has arrived’, Shri Krishna was not worried at all. He went to Lord Neminath and asked him to protect this city.I have heard that King Jarasandha wants to conquer us, so I will quickly destroy him like an old tree withered by your influence. Hearing the words of Shri Krishna, the Lord automatically, knowing the victory to be certain, said the word ‘Om’ with a smile, that is, he gave his approval. Shri Krishna also came to Kurukshetra along with all the Yadavs and Pandavas, considering his victory certain due to the smile of the Lord.

In this fierce battle, King Jarasandha got angry and fired his disc at Shri Krishna. That Chakraratna also circumambulated Shri Krishna and stopped on his right arm. What was it, Shri Krishna finished the work of Jarasandha with the same Chakra and immediately got worshiped by the Gods and became Ardhachakri (Narayan). Later, with great joy these people entered Dwaravati and received the coronation there.

One day, adorned with the clothes sent by Kuber, the young Shri Nemikumar, Baldev and Narayan etc. went to a meeting named Kusumchitra filled with millions of Yadavas. The kings left their seats and came before the Lord and saluted him. Shri Krishna also came and welcomed him. Thereafter, along with Shri Krishna, he started decorating his seat.There, in the context of the conversation, when the count of the strong started, someone called Arjun, someone called Yudhishthir, etc., someone called Shri Krishna extremely strong. Hearing various speeches, Baldev looked at God with a playful look and said that there is no one as strong as him in the three worlds, he can defeat Giriraj effortlessly, in reality he is Jinendra, who can be better than him?

Hearing these words, Shri Krishna said to God – Lord! If your body has such excellent strength then why not test it in hand-to-hand combat? God said – O elder! If you want to know the strength of my arms then what is the need for wrestling? Suddenly, please distract this leg of mine from this posture. At the same time, Shri Krishna stood up, tightening his waist, with the desire to conquer Lord Jinendra, but leave alone moving his feet, he could not move even a single finger.At the same time, due to Indra’s seat becoming vacant, Indra along with the gods came and praised and worshiped the Lord with many praises. After that everyone went to their respective palaces. Neminath’s renunciation – Once upon a time, Lord Neminath and Satyabhama etc. were doing Jalakeli in a garden named Manohar. After bathing, Shri Neminath said to Satyabhama – O one with eyes like blue lotus! You take this bathing suit of mine. Satyabhama said, what should I do with this?Neminath said that you wash it. Then Satyabhama started asking, are you Shri Krishna? That Shri Krishna, who mounted the serpent’s bed and spontaneously offered the bow named Shang and the conch that penetrated Digdigant was complete? Do you have this courage? If not then why do you ask me to wash clothes?Neminath said, ‘I will do this work well’, saying this he reached the armory. There, the king of snakes climbed on the bed of snakes decorated with great gems as if it was his own bed and with his bow, he blew the conch that stops the gap in all the directions. At that time Shri Krishna was sitting in his Kusumchitra Sabha. Suddenly they became anxious after hearing this amazing work.

With great surprise he asked the Winkars, what is this? Vinkar also found out and told the whole story. At that time, Ardhachakri Shri Krishna thought and said that it is surprising that after a long time, the mind of Kumar Neminath has become filled with passion.Now they should get married. He soon himself reached the house of King Ugrasen and requested for Shri Neminath for Rajimati daughter born from Queen Jayavati. King Ugrasen said – O God! You are the master of three parts, so who are we in front of you? The marriage was finalized at an auspicious time.

Penance of Lord Neminath

Thereafter, Lord Neminath, adorned with various types of clothes and ornaments presented by the gods, mounted on a palanquin named Chitra, surrounded by many Mandleshwar royal sons of similar age, came out to observe the directions. There he saw the deer with pitiful eyes screaming and running here and there, distraught with hunger and thirst and extremely frightened, and out of pity he asked the guards there why this group of animals had been gathered?

The servants said that they will be killed at your wedding. At the same time, Shri Nemikumar became compassionate towards the atrocities on animals and soon he became disinterested in pleasures and returned to his home feeling detached. He became frightened after remembering his many past lives.By now three hundred years had passed since the Lord’s Kumar period. Immediately after receiving the worship from the divine gods, the gods seated him on a palanquin named Devkuru and took him to the Sahasramra forest. On the evening of Shravan Krishna Shashthi, he took the rule of Tela and got blessed with Jaineshwari Diksha along with a thousand kings. At the same time the fourth mental knowledge was revealed to him.

Rajimati also decided to do penance after the Lord, so it is right because leaving aside the matter of the body, this is the justice given to the noble women even by mere words. On the day of Parna, in the city of Dwaravati, King Varadatta gathered food and gave food to the Lord, as a result of which Panchacharya was obtained i.e. the gods showered twelve and a half crore gems. There were praises like shower of flowers, shower of gems, gentle fragrance of air, dundubhi baje and ahodaanam etc.

Kevalgyan and salvation of Lord Neminath

In this way, fifty-six days of Lord’s disguised state were spent doing penance, then he reached Raivatak mountain. Taking the oil stick, he sat under a big heavy bamboo tree. On the day of Ashwin Krishna Pratipada, in the early morning in Chitra Nakshatra, Lokalokprakashi Kevalgyan appeared to the Lord. In his Samvasaran, there were eleven Ganadhars including Varadatta, eighteen thousand sages, Rajimati etc., forty thousand Aryikas, one lakh Shravakas and three lakh Shravikas.Great men like Balabhadra and Shri Krishna came to the meeting of God, heard the nature of religion and asked about all the details of their existence. At some time it was revealed through the divine voice of God that ‘Dwaravati city will be destroyed due to the anger of Dwipayan Muni’. Hearing this future accident, many great men had taken Jaineshwari initiation. In this way Lord Neminath had wandered for six hundred ninety nine years, nine months and four days.

After coming to Mount Girnar, leaving the monastery and doing yoga for one month with five hundred and thirty-three sages, the Lord attained salvation by destroying the non-living deeds at the beginning of the night in Chitra Nakshatra on the day of Ashadha Shukla Saptami. At the same time, Indradi gods came and celebrated the Parinirvana Kalyanak Mahotsav of the Lord with great devotion. May that Shri Neminath Lord grant complete peace to our conscience.

You can explore the fascinating stories of all Jain 24 TirthankarasJain Stories Exploring Jain Symbols on the Jain Sattva website. Delve into their lives and teachings to gain insights into Jain philosophy and spirituality.

Author: Admin
Jain Sattva writes about Jain culture. Explore teachings, rituals, and philosophy for a deeper understanding of this ancient faith.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *